'मेले में यायावर' का काव्य कौशल
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आचार्य भगवत दूबे
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गीत को अपना प्राण तत्व, उर्जा एवं सर्वस्व मानने वाले हिन्दी जगत के ख्यातिलब्ध मीमांसक पुरोधा कविवर डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' का सद्य: प्रकाशित गीत संग्रह 'मेले में यायावर' जीवन दर्शन का शुचितावाही रस-निर्झर है जहां मानिनी नायिका के यौवन की मधुमासी छवि छटाएं रसराज के उत्कर्ष का जयघोष करती दिखाई देती हैं। साथ ही एकान्तिक वियोगिनी पीड़ा की करूणा विगलित ध्वनियों की अनुगूंज भी सुनाई देती है। अधोलिखित उद्धरणों में दोनों दशाओं की अनुभूतियां दृष्टव्य हैं -आज मत रूठो तुम्हें सौगन्ध मेरी प्राण अपने प्यार का उपहार दे दो झूमता मौसम, खिले यौवन-कमल हैं आज मन की भावनाएं भी प्रबल हैं दब गया जो मान की चट्टान-तल में भाव के संसार को उद्धार दे दो। क्रूर समय के सर्वग्राही झंझावातों में राम-विराग की ये अनुभूतियां - धुंआ, धूल, झंझाएं, पतझड़ी, कितनी बार सहे कितनी बार गंध सागर में तैरे तिरे, बहे - अधिक समय तक नहीं टिक पातीं तब जीव जगत की तिमिरिल कुहेलिकाओं में अपनी भावनाओं को दबाकर कवि समष्टिगान त्रासद सरोकारों से जुड़कर सृष्टि का आक्रामक संधान करता है इसीलिए कवि ने प्रारम्भ में ही वर्तमान समय की क्रूरताओं से रक्षा के लिए वाग्देवी से अभ्यर्थना की है। यथा -सच का राम खड़ा है पथ पर रावण का झूठ सुसाित रथ पर एक याचना मात: मेरा राम न जाये हार। डॉ. यायावर के गीतों में जहां मानवोचित रागात्म देखने को मिलता है वहीं भारतीय संस्कृति, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं मातृभाषा हिन्दी के गौरव गान की अनुगूंज भी सुनाई देती है। किन्तु महानगर का भयानक एवं वीभत्स चेहरा देखकर कवि का मन छटपटाने लगता है। महानगर की यह विरूपता निम्ांकित काव्यांश में देखिए -आतंक, शोर, उन्माद, पोस्टर, विज्ञापन, घनघोर व्यस्तता, त्रास, लिजलिजे संबोधन, आफिस, गुटबंदी, ढोंग, बोरियत काफीघर, इस भूलभुलैया से कैसे निकलें बाहर पूरा परिवेश हुआ है जैसे एक जहर यह महानगर॥महानगर के इस घिनौने चक्रव्यूह में फंसे डॉ. यायावर के व्याकुल कवि को तब अपने गांव की मनमोहक शांति प्रदायक सुधियां बरबस अपनी ओर आकृष्ट करने लगती हैं। देखिए -फैली फसलों पर भोर किरन जब कंचन बिखरा जाती थी नटखट पुरवा आरक्त कपोलों का घूंघट सरकाती थी रोली रंगोली सतिए थे, अल्पना द्वार पर हंसता था होली, बोली, ठिठोलियां थी, प्राणों में फागुन बसता था वे गांव गली, चौबारों में खुशियों की मनमानी के दिनपहले के प्राकृतिक संपदा, आत्मीय सरसता से सम्पन्न गावों की हालत आज बद से बदतर होती जा रही है। पंचायती चुनाव एवं राजनैतिक पैंतरेबाजी की खटास वहां के मीठे रिश्तों को फाड़ती जा रही है। बापू के रामराज्य का सपना चकनाचूर हो चुका है। अपनी पहचान खो रहे गावों का दर्द, उजड़ते जंगलों एवं खेत-खलिहानों की व्यथा-कथा के साथ ही डॉ. यायावर केगीतों में भूमंडलीकरण के नाम पर फैलते सर्वग्राही बाजारबाद की चुनौतियों की गहरी चिंता दिखाई देती है। वर्तमान समाज के कुटिल वैद्रूप्य का चित्रण करते हुये आपके गीतों का पारंपरिक तेवर नवगीतात्मक हो गया है। आनुभूतिक वेदनाओं की सघन सूक्ष्म सांत्रासिक अभिव्यक्ति का नमूना इस नवगीत के काव्यांश में दृष्टव्य है -आंगन में उग रही उदासी चौराहों पर खड़े लुटेरे छीन रहीं हिंसा पगलाई सारे सपने तेरे मेरे पथ को खाने लगी दिशाएं कहो मित्र रोएं या गाएं।और भी - दर्द हुआ आवारा बेटा कदम-कदम करता नादानी बूढ़ी हुयी उमंग पर्व की पीड़ाएं हो गयी सयानी।आम आदमी के जीवन संघर्ष का यथार्थ चित्रण इन गीतों में बड़ी शिद्दत एवं मार्मिक संवेदना के साथ हुआ है। आनुभूतिक संत्रास इन गीतों में स्वकेंद्रित न होकर लोकाभिमुखी हैं। ये अभिव्यक्तियां सर्वव्यापी विडम्बनाओं का यथार्थ के धरातल पर द्योतन करती हैं। लोकधर्मी एवं सुलभ विश्वसनीय प्रतीकों, आनुभूतिक बिंबों एवं मिथकीय प्रासंगिकता को लेकर बुने गये ये गीत अपने समय के सत्यवादी प्रखर प्रवक्ता हैं। अधोलिखित काव्यांश में एक साथ बहुतेरे मिथकों की समवेत संयोजना से डॉ. यायावर ने अपने अद्भुत काव्य कौशल का परिचय दिया है -पीड़ा की मीरा को जब इतिहास पुरुष का प्याला छलता लक्ष्य बनाकर सृजन-क्रोंच को कोई कुटिल तीर है चलता जब दुर्दान्त अनल-ज्वाला में मेघदूत के पंख झुलसते अपराधों की हुंकारों में उत्तर रामचरित है जलता।डॉ. यायावर के गीतों में आनुभूतिक रागात्मक ता के स्पंदन के साथ ही समकालीन वैद्रूप्य से उपजी सर्वजनीन पीड़ा का संवेदनात्मक प्रतिबिम्बन है। आपने व्यक्तिवादी चेतना को समष्टिगत सरोकारों से जोड़नें का सार्थक एवं श्लाघनीय यत्न किया है। प्रंाजल भाषा, सुगठित शिल्प विधान एवं वक्रात्मक शब्द संधान के कारण गीताभिव्यक्ति पैनी एवं धारदार हो गयी है। सृजनधर्मी सुधी विद्वानों की समालोचनात्मक कसौटी पर कसे जाने पर ये गीत अपनी चोखी चमक से चमत्कृत करेंगे। बधाई।
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समीक्ष्य कृति - मेले में यायावर (गीत संग्रह) रचनाकार - डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा यायावर पृष्ठ - 128 मूल्य - 100 रुपया प्रकाशक - सुकीर्ति प्रकाशन, डी. सी. निवास के सामने, करनाल रोड, कैथल (हरियाणा)महामंत्री 'कादम्बरी' पिसनहारी मढ़िया के पास, जबलपुर 482003
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