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आहार-विहार और आचार

डॉ. सुनील दत्त व्यास
मनुष्य सांसारिक प्रपंचों में फंस कर इष्ट पूर्ति हेतु इतस्तत: भटकता फिरता है। वह कभी मंदिर में जाता है तो कभी मस्जिद में जाता है तो कभी गिरिजाघर में जाता है। इतना ही नहीं, वह किसी अन्य की प्रेरणा प्राप्त कर वन में देवताओं को ढूंढता है। यदि विचार किया जाए कि मानव ऐसा क्यों करता है तो कहा जा सकता है कि अज्ञान के कारण। क्योंकि जब तक अज्ञानावरण का नाश नहीं होगा तब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं होगा औैर अज्ञान का मूल कारण विष्णु की माया है जिसने सारे जगत को मोहित कर रखा है - 'विष्णोर्माया यया सम्मोहितंजगत्' माया (अज्ञान) के प्रभाव के कारण मानव देहस्थ देवताओं के ज्ञान से अनभिज्ञ है। शास्त्रों में लिखा गया है - 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' अर्थात देवता बनकर देवता की पूजा करो। तात्पर्य यह है कि शुद्ध आहार-विहार कर अपने देहस्थ देवों को सशक्त बनाएं जिससे शरीरस्थ देव शक्तियां जागृत हो जाएं फिर देवताओं का अर्चन करें। वास्तविक रूप से देखा जाए तो देवता कहीं अन्यत्र निवास नहीं करते अपितु देह में विराजते हैं। उपनिषद् इसके प्रमाण हैं।
ऋषि मुनियों ने वेदान्त में चिंतन पुरस्सर यह सिद्ध किया है कि देवताओं का निवास स्थान अपनी 'देह' ही है। हां, यों देवता सर्वव्यापी हैं पर उनका सबसे निकटवर्ती स्थान स्वदेह ही है। इस मानव शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यंगों में विभिन्न देव शक्तियों का निवास है। इसलिए साधक को अपना शरीर एवं मन इस योग्य बनाना होता है कि वहां निवास करने वाली देव शक्तियां जागृत होकर अपनी सजातीय महाशक्ति को सूक्ष्म जगत में से आकर्षित कर सकें। ऐतरेय उपनिषद् की कथा इस विषय में प्रमाण है। कथा का सारांश यह है कि सर्व प्रथम परमात्मा ने अगि् आदि सब देवता उत्पन्न कर दिये। तब वे देवता परमात्मा से बोले - हमारे लिए स्थान की व्यवस्था कीजिए जहां रहकर हम अपना आहार प्राप्त कर सकें। तब परमात्मा ने उनके लिए मनुष्य शरीर उपस्थित किया। तब देवताओं ने कहा - बस, हमारे लिए यह बहुत सुंदर स्थान बन गया। ये देवता प्रसन्न होकर बोले - यह सचमुच ही बड़ी सुंदर रचना है। तब परमात्मा ने कहा - अब तुम लोग अपने लिए इसमें उचित स्थान ढूंढ लो और उसी में प्रवेश कर जाओ। तब सब देवताओं ने स्वबुद्धि विवेक से मानव शरीर में प्रवेश कया। उनमें सर्वप्रथम अगि् देव ने वाणी बनकर मुख में प्रवेश किया। वायु प्राण बनकर नासिका में रहने शरीरस्थ देवताओं को भूख और प्यास के माध्यम से ही पोषण मिलता है। जैसा कुछ हम खाते-पीते हैं, तदनुरूप ही देव शक्ति यां सशक्त एवं दुर्बल होती हैं। सात्विक खानपान देव-तत्वों को पुष्ट करता है और आसुरी तमोगुणी आहार करने से, मद्यपान सेवन करने से देवता दुर्बल हो जाते हैं। ये देवता केवल मुख के द्वारा ही आहार नहीं लेते वरन् प्रत्येक इंद्रिय के द्वारा उसकी उचित-अनुचित प्रक्रियाओं के आधार पर ये देवता पुष्ट एवं अशक्त बनते हैं। जो अपनी इंद्रियों का दुरुपयोग करता है, उनके द्वारा अनैतिक आचरण करता है, अग्राह्य को ग्रहण करता है तो शरीरवासी देवता अशक्त व कमजोर हो जाते हैं। फिर विधि-विधान एवं मंत्र प्रक्रिया भी वैसा फल नहीं देती जैसा शरीर में पुष्ट दैवी-स्थिति होने पर दिया करती है। इसलिए देव उपासकों को इंद्रिय संयमी, सदाचारी होना चाहिए। और निश्चित रूप से आहार-विहार की शुद्धता का भी भरपूर ध्यान रखना आवश्यक है। क्योंकि 'आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि: सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति:' अर्थात जब आहार शुद्ध होता है तब सत्व यानी अंत:करण शुद्ध होता है। अंत:करण शुद्ध होने पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है। उस विवेक से अज्ञान जन्य बंधन ग्रंथियां खुलती है। फिर परम तत्व का साक्षात्कार हो जाता है। वाल्मीकि रामायण में भी यही लिखा है कि मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके शरीरस्थ देवता खाते हैं - 'यदन्न पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता:'। साधक यदि अपने शरीर-देवताओं को परिपुष्ट रखे औैर श्रद्धा विश्वास पूर्वक नियत विधि-विधान से स्वसाधना का अभ्यास करे और बाह्य खान-पान पर नियंत्रण रखे तो निश्चित रूप से देव वरदान का वही लाभ हो सकता है जो शास्त्रों में वर्णन किया गया है।
सरस्वती शिक्षण महाविद्यालय, पांडेसरा, सूरत।


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