Taptilok | Hindi Literary Magazine published from Surat, Gujarat, India. | Add to favorites
सम्पादकीय ताप्ती प्रवाह कविता कहानी लघुकथा व्यंग ललित निबंध
साहित्य विचार संस्कृति चिंतन जीवन विवेक ग्रंथावलोकन समाचार यात्रा-वृत प्रतिभाव
लोकतेज देश - दुनिया के ताजा समाचार
ग्रंथावलोकन

अनुभव के धागों से बुनी कहानियां

जय चक्रवर्ती
हिन्दी साहित्य में कहानी लेखन प्रारंभिक काल से ही होता रहा है। प्रारंभ में कहानी विशुध्द कल्पना या फेंटेसी के आधार पर लिखी गई। कहानियां जहां लोगों का मनोरंजन किए जाने का उद्द्ेश्य लेकर लिखी जाती रही है, वहीं समाज को सही दिशा देने के लिए किसी उपदेशात्मक तथ्य को लोगों के मध्य संप्रेषित करना भी कहानी का ध्येय रहा है। बाद में किसी समस्या विशेष को लेकर अथवा किसी महान लक्ष्य के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से कहानी लेखन का युग आया। मुंशी प्रेमचंद की लगभग सभी कहानियां या तो समस्या मूलक हैं या स्वाधीनता के प्रति लोगों की चेतना जागृत करने वाली हैं। आज की कहानी जहां तमाम नए-नए प्रयोगों- अनुप्रयोगों के दौर से गुजर रही है, वही कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो जीवन के यथार्थ को केन्द्र में रखकर कहानी लेखन कर रहे हैं। हरियाणा के प्रो. परमानन्द अधीर भी ऐसे ही कहानीकारों में हैं जिन्होंने अपने आसपास की घटनाओं को लक्ष्य करके रोजमर्रा की जिन्दगी में मिलने वाले लोगों को पात्र बना कर अपनी कहानियों का ताना-बाना बुना है और हर कहानी में आदमी को आदमी बनाने का मूल्यवान संदेश दिया है। साहित्य सृजन का यही उद्देश्य भी है-सहितस्य भाव: साहित्य:।
परमानन्द जी अपनी कहानियों में यथार्थ जीवन की समस्याओं की कभी अनदेखी नहीं करते। पतझड़ के बाद नामक सत्रह कहानियों का उनका संग्रह हाल ही में श्री अंगीरा शोध संस्थान जीन्द (हरियाणा) से प्रकाशित हुआ है। इन कहानियों में व्यावहारिक समाधान करते हुए जनमानस को उन्नति का पथ दिखलाने का प्रयास किया है। संग्रह की भूमिका में लेखक अपनी कहानियों के अभीष्ट को रेखांकित करते हुए कहता है - 'जीवन यथार्थ में दुख सुख, असुविधा सुविधा, असफलता सफलता आती रहती है। जो व्यक्ति दु:ख असुविधा असफलता से परास्त होने की बजाय उनका सामना करता है, वह पतझड़ को पार कर बसंत का सुख भोगता है।'
यह बात शायद बहुत कम लोगों को पता होगी कि परमानंद जी किन कष्टसाध्य स्थितियों में अपनी रचनात्मकता को बचाये हुए हैं, उन स्थितियों में आम आदमी सिर्फ अपने जीवन को ढोने के सिवा कोई काम नहीं कर सकता। पहले अध्यापन फिर राजनीति और तत्पश्चात एक दुघर्टना में बुरी तरह घायल होने के बाद वे स्थायी रूप से बिस्तर पर पड़े हैं। किन्तु उन्होंने एक पल को भी न स्वयं को कमजोर पड़ने दिया और न ही अपनी रचनात्मक ऊर्जा को प्रभावित होने दिया। यह एक अत्यन्त संघर्षशील व्यक्ति की पहचान है। यही संघर्ष उनकी कहानियों में यत्र तत्र सर्वत्र उपस्थित है।
पतझड़ के बाद संग्रह की प्रतिनिधि कहानी है। इसमें पुरूष और नारी दोनों के पतझड़ (दुख) को चित्रित करते हुए दोनों के ही जीवन में पतझड़ के बाद बसन्त (दुख के बाद सुख) को दर्शाया है। कहानी बिल्कुल सीधे समतल पथ पर आगे बढ़ती है और सब कुछ घटित होता जाता है - आकस्मिक- अकस्मात। अंत तक आते आते सारे दु:खों का अन्त होकर सुमन और बसन्त को मनचाही मुराद मिल जाती है।
जब जागे तब भोर कहानी दाम्पत्य जीवन को सरल, सुखमय, शांतिपूर्वक बिताने के अमूल्य मन्त्र हमें देती है। ये मन्त्र अगर पति पत्नी जीवन में उतार लें तो दोनों के मध्य कभी कोई मनमुटाव हो ही नहीं सकता। कुछ सूत्र दृष्टव्य हैं - दाम्पत्य का महल प्रेम और विश्वास की ईंटों और चूने से बनता है। संदेह तो वह सीलन है जो उसकी दीवारों को भुरभुरा बना कर गिरा देती है। 'मनुष्य का यह अबूझपना बड़े काम की चीज है। इसी कारण से पति पत्नी एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। पति पत्नी यदि पूरी तरह अनावृत्त हो जाए तो उनमें आकर्षण नहीं रह सकता।'
'' ङ्गङ्गङ्गङ्ग पुरूष तो वह नम्बरी ताला है जो चार अक्षरों रुह्रङ्कश्व से खुलता है।''
संग्रह की कहानी घर का नाग में एक जवान स्त्री को उसके पति की असमय मौत के पश्चात उसके नितांत अपने लोग भी किन सीमाओं तक गिरकर उपयोग करने का प्रयास करते हैं, यह दर्शाया गया है। बहू ससुर के पवित्र सम्बन्धों को तार-तार करती यह कहानी यही दर्शाती है। कहानी की खास बात यह है कि कहानीकार ने स्त्री को मर्यादाहीन ससुर के आगे हारने नहीं दिया। मेघा सारी सुख सविधाएं त्याग कर घर से दूर अपना स्थानान्तरण कराने का प्रयास करती है किन्तु अपने कामुक ससुर के आगे आत्मसमर्पण नहीं करती। कथावाचक दीपा का कथन - मर्यादाहीन पुरूष कितना घिनौना जीव बन जाता है। वह पशु पक्षियों से भी नीचे गिर जाता है। वे अपने धर्म के अनुसार मादा से संयोग करते हैं। मर्यादाहीन पुरूष तो निरा पिशाच होता है। वह न तो प्रकृति के नियमों पर चलता है और न ही मानव समाज की परंपराओं का पालन करता है - आज के पतनशील मानव का यथार्थ चित्रण करता है।
संग्रह के कहानी चिब्बड़ निश्छल प्रेम को समर्पित कहानी है। इसमें कथावाचक अपने पहले प्रेम को भूल नहीं पाता।
......... और वह लौट आई कहानी में लेखक ने ऐशो आराम की चाह में अपनी सामाजिक मर्यादाओं तथा हंसते खेलते घर को छोड़ने वाली महिलाओं को पुन: सही मार्ग पर लाने का मार्ग दिखाया है। शशि जो कहानी की मुख्य किरदार है, कुछ समय के लिए अपनी राह से भटकती अवश्य है। किन्तु बाद में संभल जाती है। इस प्रकार की कहानियां समाज का, आज के ऐसे समय में जबकि हर कोई पैसे और सुख सुविधाओं के पीछे अपने नैतिक जीवन मूल्यों को पीछे छोड़ रहा है, बहुत अच्छा संदेश देती है।
परख कहानी सच्चे प्रेम की परख करना सिखाती है। कहानी मुझे क्या? में शहरी सोच पर चोट है। कथावाचक के मुझे क्या? वाली सोच के कारण एक भोली युवती का वेश्यालय में पहुंचना दिखा लेखक ने परोक्ष रूप में व्यक्ति को इस असामाजिक सोच को त्यागने का संदेश दिया है। ऐसी घटनाएं हमारे आस-पास घटती हैं। लेखक ने अपने अनुभूत को समाज के हाथ सांझा किया है।
संग्रह की अन्य कहानियां - तूफान के बाद, अपराजेय, निवेश, घर परिमार्जन,र् कत्तव्य बोध, एक उपाय और, प्रहरी, प्रेम का पात्र तथा एक मुट्ठी अहसास हैं। प्रत्येक कहानी कुछ न कुछ सुखद, अनुकरणीय अनुसरणीय संदेश देती है।
भाषा की दृष्टि से संग्रह की सारी कहानियां सरल, संप्रेषणीय और बोधगम्य है। भाव विचार एवं अभिव्यक्ति का ढंग एक दूसरे से ऐसे गुंफित हैं कि पाठक एक ही बैठक में सारी की सारी कहानियां पढ़ लेना चाहता है। कहीं कोई घुमाव या उलझाव दिखाई नहीं देता है। सब कुछ सीधा सरल। कोई पाखंड नहीं। कोई आडम्बर नहीं। सभी कहानियां मध्यम वर्गीय समाज की समस्याओं, चिंताओं और परोपकारों से रूबरू होती हैं तथा समाज के संघर्षों से टकराती हैं।
आशा की जानी चाहिए कि इस संग्रह की कहानियां पाठकों के मध्य पूरे स्नेह और आदर के साथ पढ़ी जाएगी। परमानंद जी 68 वर्ष की उम्र में जिस सक्रियता-सजगता के साथ लिख रहें हैं, इसे देखते हुए भविष्य में उनसे और बेहतर लेखन की उम्मीद करना अनुचित नहीं होगा।
राजभाषा अधिकारी
एम. 1149, जवाहर विहाररायबरेली-10 (उ.प्र.)


हमारे साथ विज्ञापन करें | अपने सुझाव | सबस्क्राईब करे | सूचना | हिन्दी साहित्य की प्रमुख वेबसाईट्स
ताप्तीलोक पब्लिकेशन्स, गंगोत्री, न्यू सिविल रोड, सूरत - 1
2005-07 copyright www.taptilok.com | Taptilok | Hindi Literary Magazine
Designed by Sri Technocrat | Best viewed in 800 X 600