रिश्ते
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डॉ. मालिनी गौतम
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बहुत उलझ गया है यह रिश्ता, तो चलो सुलझा लें एक आसान तरीका अपना लें, सब कुछ भुला लें और हो जाएं दूर, धीरे...धीरे, कर दें रिश्ता खत्म, धीरे...धीरे 'स्लो पॉयान' की तरह धीरे-धीरे मरने के लिए हर दिन एक कुल्हाड़ी की मार सहन करनी होगी, तभी तो रिश्तों का वट वृक्ष हर दिन थोड़ा-थोड़ा कटेगा गिरेगा और फिर मर जायेगा। टूट जायेंगे रिश्ते हरी-चमचमाती पत्तियों से डालियों से और वृक्ष पर बसने वाले बेनाम पंखियों से, एक रिश्ते से जुड़े अनगिनत रिश्ते। पर क्या टूट पायेगा रिश्ता जड़ों से? कैसे निकल पायेगा प्रेम का बीज जो दबा हुआ है कहीं गहराइयों में मनुष्य नाम का प्राणी है बड़ा स्वार्थी, दर्द से डरता है, बड़ा घबराता है दूर भी होता है तो धीरे-धीरे एक और रिश्ते का सहारा ढूंढ़ लेता है एक रिश्ते को खत्म करने से पहले। पर इस तरह थोड़ा-थोड़ा मरने से तो बेहतर है मर जाना एक बार में पर उफ ये आदमी! किश्तों में जीने की आदत हो गयी है इसे, अब तो संबंध और प्रेम भी 'इंस्टोलमेंट' में होते हैं। पर क्या इतना आसान है दूर होना? किसी को भुलाना? वृक्ष के नामोनिशान को मिटाना? हर दिन अन्दर कुछ टूटता है और किरचें चुभती रहतीं है बड़ी देर तक हम भुलावे में जीते रहतें हैं कि भूल रहे हैं किसी को और हो रहे दूर धीरे....धीरे, जब-जब गहराई में दबे बीज को मिलेगी हवा, मिट्टी, पानी और अनुकूल वातावरण हरी कोंपलें फिर से फूटेंगीं यादें फिर हो जायेंगी ताजा और ऑंखें हो जायेंगी नम अपनी ही बेवफाई पर।
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व्याख्याता अंग्रेजी आट्र्स एण्ड कोमर्स कॉलेज, संतरामपुर-389260 (गुजरात)
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