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सोच एक औरत की
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डॉ. मृदुल जोशी
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1. मैं कालिप्सो हूं एक थर-थर काँपती कटोरी चाँद की। अंगों पर जिसके बंर्फ के ंफाहों-सी पुश्किन की अस्वीकृति झर-झरकर चूमते हुए ठोस की शक्ल में जम गयी है तब से आज तक किसी अजाने अम्बर के अनचीन्हें गिरिजाघर में बन्द फक्क पड़ते वजूद के पन्ने पर अपने औरत होने की इबारत को सोच की उँगली से रगड़-रगड़कर धुंधला रही हूँ। 2 मैं उन मोतियों को चुगना चाहती हूँ जो तेरे सोच के पहरे और होठों के तालों में गुमा दिये गये है मैं चुप्पी की बदली के रेशम से छोटा-सा टुकड़ा चीर कर उन हरूंफों को काढ़ना चाहती हूँ जो तेरे अहसास के तलुओं और पोरों को चीस रहे हैं दर्द की चिड़िया चींख रही है लगातार और उसकी आवाा की शंक्ल में बहता लावा आग और धुऑं, तेरे - मेरे वाूद के अक्षरों को झुलसा रहा है।
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5, मां जयश्रीजीपुरम कनखल हरिद्वार (उत्तरांचल)
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