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कविता

अच्छा लगता है

डॉ. सविता मिश्र
अच्छा लगता है
किसी छुट्टी वाले दिन
अतीत की अल्मारी से
किसी मनपसंद किताब को निकालना
और खुशबू वाली चाय की
चुस्कियों में डूब कर
एक-एक शब्द में डूबते जाना।
अच्छा लगता है
पालतू तोते के साथ बतियाना,
आंगन में फुदकती चिड़िया के साथ हो लेना
या फिर मिनी के लिए
आटे की चिरैया बना कर देना।
अच्छा लगता है
बरसों पुरानी चिट्ठियों को पढ़कर
कभी हँसना तो कभी रोना...
और खुशबू वाली ठंडी हो चुकी
चाय को एक ही साँस में पी लेना।
अच्छा लगता है
छुट्टी वाले दिन
आया की छुट्टी कर देना
और तुम्हारे लिए नाश्ता बनाना
या फिर शर्ट का टूटा बटन टाँक देना।
इन्हीं यादों के साथ
अच्छा लगता है बाकी के छ: दिन
मैट्रो में सफर करना
ऑफिस की पॉलिटिक्स को सहना
बॉस की झिड़कियाँ सुनना
और सुबह से निकलकर देर रत को लौटना॥
29210, साहित्य विहार
बिजनौर (उप्र.) 9719659317


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