कन्हैयालाल सेठिया का रचना-संसार
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डॉ. तारादत्त 'निर्विरोध'
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कविवर कन्हैयाला सेठिया हिन्दी एवं राजस्थानी की पूर्ववर्ती पीढ़ी के उन रचनाकारों की पंक्ति के अग्रणी कवि हैं जिन्हें ऊँगलियों पर गिना जाता रहा है। वे अखिल भारतीय ख्यातिलब्ध राजस्थान के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएँ पाँच दशक पूर्व ही अपने पांवों चलकर देश के सुविस्तीर्ण कर्म क्षेत्र के पाठकों तक पहुंची और उनके मनों में रच-बस गयीं। लेखक ने भी उनकी राजस्थानी कविता ''पातल और पीथल'' शुरू बचपन में ही पढ़ी थी और उससे इतना प्रभावित हुआ था कि वर्षों तक कविता की पंक्तियाँ अधरों से ढरती रहीं। सेठियाजी से मिलने की उत्कंठा लेखक के मन में निरंतर बनी रही और लेखक उनसे कोटा में तब सम्पर्कित हुआ जब वे बम्बई से लौट रहे थे। याें तो कन्हैयालाल सेठिया की कविताओं से लेखक का परिचय विगत 55 वर्षों से रहा और उनसे मिलने के बाद उसे पहली अनुभूति यह हुई कि यदि सेठियाजी की कर्मस्थली उत्तर प्रदेश रही होती तो वे उस सम्मान के अधिकारी थे जो उनके बाद के कवियों को उनसे पूर्व मिला, लेकिन यह भी कम बात नहीं रही कि शूरमाओं, सन्तों एवं साधकों की लीलास्थली राजस्थान ने कवि कन्हैयालाल सेठिया जैसी प्रतिभा की जन्मभूमि होने के गौरव को जिया। सेठियाजी प्रान्त के प्रतिनिधि कवि के रूप में बहुचर्चित एवं बहुपठित साहित्यकार रहे और निरपेक्ष भाव से साहित्य सृजन में रत सेठियाजी ने दलगत नीतियों, विवादों एवं जोड़-तोड़ के तौर-तरीकों से विमुख रहकर अपने को सृजनशील बनाए रखने में ही सुख अनुभवा। सेठिया जी की सामान्य आदतों को वर्णित नहीं करते हुए कहना चाहूँगा कि वे आज तक उन्हीं साहित्यकारों से जुड़े हैं जो सृजनशील है या साहित्यसृजन के लिए संकल्पित अथवा मौलिक साहित्य के बल पर चर्चित। सेठियाजी के साथ ऐसे साहित्यकार कभी नहीं रहे जो सिर्फ लिखने के लिए लिखते हों या लिखना जिनके लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने का एक विकल्प हो। वे प्रतिभाशाली रचनाकारों से मिलते भी हैं, उनके साथ साहित्य की चर्चा भी करते हैं और जब किसी की कोई अच्छी रचना पढ़ते हैं तो उसे बधाई भी लिखते हैं। बात शायद 1972 की रही होगी, कोटा की गर्म और उद्योगों की धुंआओं को जीती हुई एक पीली दोपहर में कोई 5 किलोमीटर चलकर लेखक सेठियाजी से मिला और वे तपाक से बोले, तारादत्त तुम्हारे 'काँच के गिलास हैं कि आदमी' का जबाव नहीं है। अभी बम्बई से लौटते में कादम्बिनी खरीदी और पृष्ठ खोला, तुम्हारा गीत छपा था, यात्रा सुखद हो गई, सारी थकान जैसे उतर गई और उस पंक्ति 'मीलों की प्यास है कि आदमी' ने बरबस ही मन को झकझोर सा दिया और पढ़ा 'सांझ के उजास है कि आदमी' तो भाई जीवन के कटु यथार्थ और क्रूर सत्य से सम्बन्ध हो गया मेरे पाठक मन का। तुम वाकई में अच्छा लिखते हो और खूब लिखते हो। मैं आजकल कविताएं कम ही पढ़ पाता हूं यही कोई दो-तीन और वह भी दिनों से। बात कविता और कवियों पर चली तो बहस लम्बी हो गई। वे कहने लगे, 'भाई शब्द संचय ही कविता होती तो कोई भी कवि हो जाता और यदि ऐसा ही स्वीकार होता तो आधुनिक काल के कवियों के बाद डॉ. धर्मवीर भारती, भवानी प्रसाद मिश्र और गिरिजा कुमार माथुर जैसे साहित्यकार कवि नहीं कहे जाते। हो यह रहा है कि परिवेश, स्थिति एवं क्षणानुभूति को ही कवि कविता समझ बैठे हैं और कविता करने के लिए काव्य सूत्रों को मनचाहे ढंग से बिखेर कर कोई भी रूप देने को प्रयत्न साध्य है। सेठियाजी की बातें मन को काफी गहरे तक छू गई थीं। लगता था शब्द, शिल्प, कथ्य और अर्थवत्ता जैसी बातें कविता तक हैं, पाठक या श्रोता उसे किस रूप में ग्रहण करता है या कितना सम्मान देता है, यह एक अलग बात है। देखा जाए तो राजस्थान की पूर्ववर्ती पीढ़ी में डॉ. सुधीन्द्र, नन्द चतुर्वेदी, रामनाथ कमलाकर, डॉ. प्रकाश आतुर, ज्ञान भारिल्ल एवं कुछ अन्य कवियों के बाद ऐसा कोई कवि नहीं हुआ जिसका आशीर्वाद हिन्दी एवं राजस्थानी की नई पीढ़ी को मिलता और उसका मार्ग प्रशस्त होता। नई पीढ़ी के पास जो जमीन है उसकी अपनी है और वह उसे विरासत में नहीं मिली। सेठियाजी ने एक निष्पक्ष भाव को यों प्रकटाया-'आज की पीढ़ी में जो लोग अबाध गति से और अच्छा लिख रहे हैं मैं उन में मणि मधुकर और तुम्हारा नाम हर बार दुहराता हूं। यह बात समझने की है कि रचनाकार जीवन के शार्टकट से नहीं साधना के रास्ते से चलता है और जिसमें जितना है वह उतना ही व्यक्त कर पाता है। यों लिखने को तो बहुत कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन उसमें कितना क्या साहित्य है यह पहचानते विलम्ब नहीं लगता। राजस्थान से आज जो लोग हिन्दी पत्रिकाओं में या कवि सम्मेलनों में पूर्णतया छाए हुए हैं उनमें भी कुछेक ही लिख पा रहे हैं। राजस्थानी की स्थिति अभी तक अधिक स्पष्ट नहीं है, लेकिन एक अन्तराल के बाद वह सब कहीं सम्मान अर्जित करेगी और हिन्दी के लिए तो सुविस्तृत विषय प्रदेश है कोई कितना ही लिखे।' बाद में सेठियाजी ने जब मुझे अपनी काव्यकृतियां भेजी और मैंने उन्हें आद्यंत पढ़ा तो लगा उनका साहित्यकार जीवन एवं दर्शन के सेतु से चलकर नवीन के उस गन्तव्य तक पहँच गया है जहां परंपरा, प्रगति और प्रयोग का कोई संगम है। उनकी राजस्थानी काव्यकृति ''मींझर'' की गीति-रचनाएं राजस्थानी अंचल की उस लोकपरक शैली का प्रतिनिधित्व करती है जहां शिल्पगत वैशिष्टय भी है, शब्द और अर्थवत्ता भी और गीतात्मकता के साथ कथ्य की सहजता-सरलता भी। सेठियाजी की प्रकाशित कृतियों में ''वनफूल'', ''अगि् वीणा'', ''मेरा युग'', ''दीप किरण'', ''प्रतिबिम्ब'', आज हिमालय बोला, ''खुली खिडकियाँ चौड़े रास्ते'', ''प्रणाम'', ''मर्म'' एवं ''अनाम'' हिन्दी भाषा की और ''मींझर'', ''गलगचिया'', ''कूंक'' तथा ''रमणिये रा सोरठा'' राजस्थानी भाषा में लिखी ऐसी काव्यकृतियां हैं, जिन्हें पढ़कर उनकी काव्यधारा में बहा जा सकता है, पुण्य कमाया जा सकता है, गो वे अपनी कोई सानी नहीं रखतीं। ये कृतियां एक सम्पूर्ण कवि की उपस्थिति और उसके होने के सत्य की निकटता से सभी को जोड़ती है। सेठियाजी की साहित्यिक देन से हिन्दी पठित जगत को भिज्ञ कराने के लिए गोविन्द शर्मा ने ''श्री कन्हैयालाल सेठिया और उनका साहित्य'' शीर्षक कृति में उनके जीवन विषयक और साहित्यगत तथ्यों को उभारने का प्रयत्न किया है और अरूण कुमार भट्ट ने उनकी काव्यकृति ''प्रतिबिम्ब'' को ''रिफलेक्शन्स इन ए मिरर'' शीर्षक से अंग्रेजी में अनूदित किया है। कहना चाहूँगा सेठियाजी के बारे में अभी भी बहुत कुछ लिखा जाना शेष है और इस दिशा में शोधकर्ताओं को पहल करनी चाहिए। सुजानगढ़ राजस्थान में जन्में सेठियाजी के हिन्दी में लिखे गीतों का संग्रह है ''दीप किरण'' इन गीतों को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे आप सतत प्रवहमान मन्दाकिनी में डुबकियाँ लगा रहे हैं। इन गीतों में 'कल्पना, अनुभूति एवं चिंतन का अपूर्व संगम है। रामनिवास ढंढारिया के शब्दों में ''श्री सेठिया का संपूर्ण काव्य जीवन चरम विरोधी धाराओं के बीच विराजित सत्य के अस्तित्व को ढूंढ़ने की गूढतम अनुभूतियों की जय यात्रा हैं। कवि चिरंतन का साधक है और उसने अपने अनुभूत भावमुक्ताओं को गीत सीपियों में भर दिया है।'' ''दीप किरण'' के गीत बड़े ही सहज, मधुर और गूढ़तम अनुभूतियों के ऐसे गीत हैं जो गेयता और अनुगूंज रखते हैं, तथा:-रवि किरणों का ताप नहीं है, चपला का उत्ताप नहीं है, अर्ध्दनिशा का प्रिय पंथी बता सकेगा मोल, दीप की यह किरणें अनमोल! जो नयनों से ढ़ल जाता है, ऑंसू भी हैं, सपना भी है, जो गीतों में बस जाता है छाया भी है, अपना भी हैं, जो अनुभूत हुआ अन्तर में कल्पित है, रचना भी है।कहीं-कहीं तो सेठियाजी का काव्य सूत्र-सा लगता है, कहीं एक संश्लिष्ट अर्थ-सा और कहीं श्लोक जैसा। गीतों की पंक्तियाँ पढ़ते समय लगता है जैसे आप मन्त्रोचार कर रहे हों और कभी ऐसा भी कि मन उन पंक्तियों को गुनगुनाने लगता हो- कीचड़ की अभिव्यक्ति कमल है, चांद सितारों की धर दुनिया, अन्धकार का अन्तस्तल है। ''''''''''''''' आंसू की सत्ता है अपनी, पर मुस्कान अधर पर निर्भर। ''''''''''''''' मैं अपरिचित प्राण में, तेरा मृदुल परिचय लिए हूं ''''''''''''''' जीवन के सत्य-असत्य, राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, सुख-दु:ख, संयोग-वियोग, मिलन की उत्कंठा, दार्शनिकता, प्रकृति के उपादान, राग-रोगन और दूर-निकट की क्षणानुभूतियों को सेठियाजी ने अपने गीतों में बखूबी काव्यांकित किया है और सोलह मात्रिक छन्दों में एक नये अर्थ को पिरोने का उनका प्रयास काव्य को विकास देना रहा है। काव्याकाश के नए क्षितिज खोजने और बहुआयामी गतिविधियों को ज्यों का त्यों चित्रांकित करने में सेठिया जी एक सफल कलमकार हैं जिन्होंने बहिरंग को अन्तरंग के माध्यम से प्रस्तुत किया है। उन्हें अन्तर्मुखी गीतकार और कवि के रूप में भी पहचाना जा सकता है। ''प्रणाम'' के गीतों की मधुर झंकृति पाठक या श्रोता को टबोकती भी है और उसके लिए ऐसे रंग भी उकेरती है जो रूचिकर हो। ''प्रणाम'' के गीतों में कवि दार्शनिक हो गया है और उसे हर वस्तु और बात में कोई गहनता दिखाई देने लगी है। उस राग तत्व और अकान्तिक रिक्तता के साथ आभास की स्थितियां भी विमोहित किए हैं यथा:-रागों के मेले में नभ का सूनापन खो जाता, पीकर स्वर का स्नेह पंथ का हृदय सदय हो जाता। ध्वनि अपना इतिहास सदा ही प्रतिध्वनि से लिखवाती, चेतन का संगीत बावरी जड़ता ही दुहराती। मतकर क्षण से द्रोह समय का निर्णय क्रूर बहुत है, मतकर धीमा गीत अभी तो मंजिल दूर बहुत है।भारतीय दर्शन की विशिष्टता और वेदान्त की निगूढ़तम अनुभूतियों को सरल, सरस एवं हृदयगाही शब्दों तथा शैली में जिस तरह सेठियाजी ने अभिव्यक्त किया है, वे चिन्तकों और साधकों की जिज्ञासाओं और शंकाओं को दिशा-बोध देने में समर्थ प्रतीत होती हैं। सत्य के अस्तित्व को ढूंढ़ने की कवि की दृष्टि चरम के पार-द्वार तक पहुंचती है। वह कहता है:- चिर असंग के लिए न कुछ है मेरा और तुम्हारा, परमहंस के लिए न कोई है चन्दन-अंगार। ''''''''''''''''''''' बरगद का बढ़ना निश्चित है नीले नभ में, किन्तु उलझती ही रहती है जटिल जटाएं। '''''''''''''''''''''''' मैं अनादि हूं मुझे व्यापता कभी नहीं इति-अथ का संशय, मैं अरूप अनुभूति चिरंतन पूर्ण मात्र ही मेरा परिचय। '''''''''''''''''''''''' ''खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते'' की कविताएं प्रयोगपरक रचनाएं हैं जो प्रतीकात्मक भी हैं और नई-नई संज्ञाओं में गुथी हुई भी। यथा:-टाइपिस्ट चांद दिवस कागज के नीचे रात का कार्बन पेपर धर समय टाइप के की-बोर्ड पर अंकित नखत अक्षरों पर किरण अंगुलियां चला सूरज के लिए आमन्त्रण पढ़ टाइप कर चुका है, क्लर्क आकाश ने उसे ऊषा के गुलाबी लिफाफे में बन्द कर दिशा चपरासिन को दे दिया है। '''''''''''''''''' शरद की ठिठुरती सुबह को पहना दिया सूरज को धूप का स्वेटर। '''''''''''''''''' चुपके बियाबान में बैठ गई है आकर, आवाज का चिड़ियां। ''''''''''''''''' ये खिड़कियां, खेलती रहती हैं आंखमिचौली, जैसे हों शरमीली लड़कियां।अधुनातन युगीन बातों, खूबियों और नवीनताओं को सेठियाजी ने नए-नए प्रयोगों के साथ अपनी कविताओं में लिखा है। वे राजस्थानी एवं हिन्दी गीतों के साथ काव्य की जिस परंपरा का निर्वाह करते हैं वहां नई और प्रतीकात्मक कविताओं के काव्य को गति भी देते हैं तथा क्षणिकाओं के साथ काव्य को उस प्रगति तक ले जाते हैं जो कल्पनातीत हैं। वे एक माने में परम्परावादी हैं, दूसरे में प्रगतिवादी और तीसरे में नितान्त प्रयोगशील। ''प्रतिबिम्ब'' उनके गीतों की तीसरी कृति है। ''मर्म उनकी मिनी कविताओं का ऐसा संग्रह है जिसे पाठकों के स्नेह की अपेक्षा है। ये ऐसी कविताएं हैं जिन्हें सहज ही नहीं समझा जा सकता और वे विचार की अपेक्षा रखती है, ये कविताएं क्षणिकाएं भी हैं, सूत्र भी और संकेत भी। ''गलगाचिया'' सेठियाजी की राजस्थानी भाषा में लिखी गद्यकृति है जो कथात्मक है, प्रेरणादायक कथा सूत्रों की एक माला है और लेखक की सूझबूझ की साक्षी भी। सेठियाजी के राजस्थानी में लिखे गीतों में सर्वाधिक प्रसिध्द गीत है ''धरती धोरां री'' और कविताओं में ''पाताल और पीथल''। उनके अन्य गीतों में लोकांचल की झांकियां और खूबियां मिलती हैं, लेकिन उनका स्तर है। समग्र रूप से मूल्यांकित किया जाए तो कन्हैयालाल सेठिया राजस्थानी से कहीं अधिक हिन्दी भाषा के रचनाकार हैं। महामनीषी पद्मश्री सेठियाजी निग्रन्थ काव्यकृति पर भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली द्वारा मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार, राजस्थानी काव्य कृति लीलटांस पर साहित्य अकादमी नई दिल्ली से श्रेष्ठ कृति पुरस्कार और अन्य कृतियों पर भी पुरस्कारों से सम्मानित किए जा चुके हैं।
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254, पद्मावती कॉलोनी ए अजमेर रोड जयपुर-302019
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