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क्यों पढ़ें प्रेमचन्द को ?

डॉ. अशोक कुमार मिश्र
अपने युग के सर्वमान्य स्त्रष्टा प्रगतिशील कथाकार मुंशी प्रेमचंद की प्रासांगिकता आज प्रश्नों के घेरे में है उन पर पुरानेपन का आरोप लगाया जाता है। कुछ सुधी आलोचकों की दृष्टि में उनका साहित्य वर्तमान चुनौतियों और समस्याओं का मुकाबला करने में असमर्थ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनका साहित्य अपने समय के भारतीय समाज का जीवंत और प्रामाणिक दस्तावेज है साथ ही उनका सुधारवाद राष्ट्रीय आंदोलन की तत्कालीन चेतना और गांधीवादी जीवन दर्शन व साम्यवाद से एक सीमा तक प्रभावित भी है किन्तु आजादी के बाद उन मूल्यों व आदर्शों की चमक फीकी पड़ती गई आज नवीन कथ्य, नई टेकनीक, अभिनव शिल्पगत प्रयोग और अत्याधुनिक कला-प्रवृत्तियाँ-नग्नता, अतियथार्थवाद, पाश्चात्य प्रभाव आदि के अंतर्गत कथा-साहित्य में विशुध्द कलावादी मानदण्डों को प्रमुखता मिल रही है, जिसके फलस्वरूप मुझे चाँद चाहिए, दो मुरदों के लिए गुलदस्ता जैसी रचनाएँ पुरस्कृत हो रही है ऐसे में आदर्शोन्मुख यथार्थवादी सामाजिक कथाकार के लेखन की प्रासांगिकता को लेकर कुछ प्रश्न व जिज्ञासाओं का उठना स्वाभाविक ही है। अपनी सांस्कृतिक विरासत से निरंतर दूर वैभव की सर्वग्रासी चमक से विमोहित और चाँद को छू लेने को आतुर आज का युवा भी जानना चाहता है कि आखिर ऐसा क्या है प्रेमचंद के साहित्य में जो इसे पढ़ा जाए अथवा उनके विचार भावी पीढ़ी के लिए धरोहर के रूप में संरक्षित रखे जाएँ। इस नई पीढ़ी को हम प्रेमचंद की मूलभूत जीवन दृष्टि, उनकी भाषागत सामर्थ्य, मानवतावाद या फिर परंपरा मात्र की दुहाई देकर संतुष्ट नहीं कर सकते अतएव यहां केवल उन्हीं बिंदुओं की ओर पाठकाें का ध्यान आकृष्ट किया जा रहा है, जो प्रेमचंद-साहित्य की प्रासांगिकता के मेरूदण्ड हैं।
प्रेमचंद जन-साहित्य निर्माता थे। उनकी रचनाओं में हजारों साल से अवमर्दित, शोषित और उपेक्षित जनता, यहां तक कि घरेलू जानवरों-कुत्ता, बैल आदि तक को प्रतिनिधित्व मिला। उनकी भावनाओं के साथ जन सामान्य की जीवन दृष्टि, उसकी आशा-आकांक्षा व समस्याओं का मार्मिक चित्रण और साथ ही उनके व्यावहारिक समाधान का जैसा उद्धाटन प्रेमचंद द्वारा किया गया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अपने समय के भारत का जीवंत चित्र अपनी लेखनी के सहारे साहित्य जगत, के सामने रखकर किसानों और मजदूरों की कारूणिक दशा के निदर्शन के साथ औद्योगिकीकरण से उत्पन्न संकट, सांप्रदायिक वैमनस्य और अनेक कुप्रथाओं- जैसे-दहेज प्रथा, छुआछूत, वेश्यावृत्ति, बाल विवाह, विधवाओं की समस्या, परिवारों के विघटन आदि से जुड़ी घरेलू समस्याओं का, जो व्यावहारिक समाधान भारतीय समाज के समक्ष रखा है, वह अपनाए जाने योग्य है। उनकी समतामूलक मानवतावादी दृष्टि प्रेम की संजीवनी से पोषित और त्याग, करूणा, उदारता, नैतिकता व भाईचारे की भावना से और भी मजबूत हुई है। ये प्रवृत्तियाँ और मूल्य किसी भी राष्ट्र के नागरिक के लिए सदैव अनुकरणीय रहेंगे। इनसे देश और समाज की एकता भी अखण्डित रखी जा सकती है। प्रेमचंद युगानुरूप विकसित सांस्कृतिक पुनरूत्थान की चेतना, जीवनादर्शों और मानवीय संवेदना के कुशल संवाहक थे और यही विशेषता उन्हें रामानंद, कबीर और गोस्वामी तुलसीदास जैसे लोक नायकों से जोड़ती है।
उनकी तमाम कहानियाँ-'पंच परमेश्वर', 'ईदगाह', 'बड़े भाई साहब', 'बूढ़ी काकी', 'मंत्र' आदि- भारतीय संवेदनाओं जैसे प्रेम, करूणा, उदारता, परस्पर विश्वास के निदर्शन के साथ यह बोध भी जागृत कराती हैं कि हरेक आदमी में इंसानियत मौजूद है भले ही कुछ समय के लिए वह भटक जाए किन्तु सही मार्ग पर वापस आने की गुंजाइश सदैव बनी रहेगी। इसी प्रकार 'दो बैलों की कथा' के प्रतीकत्व को यदि आत्मसात करें तो हम देखते हैं ऐसे ही समर्पण और प्रेम-निष्ठा की आज पग-पग पर आवश्यकता है इन्हीं संवेदनाओं के सहारे आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा का मुकाबला किया जा सकता है।
निरंतर हो रही आर्थिक प्रगति और उपलब्धियों के बावजूद देशवासी आज सांप्रदायिक हिंसा और आतंकवाद का दंश झेलने के लिए विवश हैं यह उन्माद विविध रूपों में सामने आ रहा है। मैं दृढ़तापूर्वक कहना चाहता हूँ कि राष्ट्रीय स्तर की जटिल समस्याओं के समाधान में प्रेमचंद का साहित्य हमारा मार्गदर्शन कर सकता है। उनकी रचनाओं में हिंदू-मुस्लिम संबंधों का जो स्वरूप वर्णित है वह धार्मिक कट्टरता से पूरी तरह मुक्त है। 'पंच परमेश्वर' का जुम्मन शेख, 'डिक्री के रूपये' का नईम, 'मंदिर और मस्जिद' का चौधरी इशरत अली, 'कर्मभूमि' का सलीम, 'जुलूस' का इब्राहिम, 'गबन' की जोहरा, 'गोदाम' के मिर्जा खुर्शेद जैसी पंथ निरपेक्ष दृष्टि वाले लोग आज भी समाज में अपनी उपस्थिति र्दा कराते हैं, इसीलिए तो सांप्रदायिक व आतंकवादी एवं विखण्डनकारी शक्तियों के मंसूबे धराशयी हो जाते हैं। इसमें भी कोई शक नहीं कुछ सांप्रदायिक ताकतें प्रेमचंद के युग में सक्रिय थीं तभी तो आगे चलकर देश का विभाजन हुआ किंतु प्रेमचंद इनसे आजीवन संघर्ष करते रहे वे हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और मानवतावाद के प्रबल पक्षधर थे। 'सेवासदन', 'प्रेमाश्रम', 'कायाकल्प', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि' जैसे अपने उपन्यासों में जहाँ एक ओर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक विद्रूपता को दर्शाकर सांप्रदायिक वैमनस्य और विद्वेष के प्रति आम आदमी में वितृष्णा उत्पन्न करते रहे साथ ही मानवीय संवेदना, सद्भाव और सहनशीलता के आधार पर इनके आपसी झगड़ों और मनमुटाव को दूर करने की बात कहते हैं। उनका यह समाधान आज भी कारगर है और कल भी उपयोगी रहेगा।
प्रेमचंद ने सामंती सोच रखने वाले भाषा वैज्ञानिकों के इस विचार का जोरदार खण्डन किया कि भाषा का आधार धर्म या संप्रदाय है। इस प्रकार भाषागत प्रश्न को लेकर उनके साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है। हिंदी-उर्दू का विवाद पहले भी था और आज भी है। प्रेमचंद, साहित्य में सरल और बोलचाल की भाषा के पक्षधर थे। उनके विचार से देश की राष्ट्रभाषा हिंदी और उसकी लिपि नागरी होनी चाहिए लेकिन उर्दू तथा अन्य भारतीय या विदेशी भाषाओं की शब्दावली से, भले ही वे शब्द अरबी, तुर्की, पुर्तगाली या फिर अंग्रेजी के ही क्यों ना हों, उन्हें कोई परहेज नहीं था। उन्होंने अपने लेखों में इस मत को व्यक्त किया है कि देश के अन्यान्य भाषा-भाषी यदि नागरी लिपि को अपना लें तो पूरे देश में भाषिक एकता आ सकती है। उनकी यह भाषा नीति वर्तमान संदर्भ में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।
प्रेमचंद ने अपने साहित्य में औद्योगिक नैतिकता का वर्णन करके उद्योगपतियों की जिस मनोवृत्ति के विरूध्द जनमत तैयार किया वह आज भी प्रेरक है। दीन-हीन, शोषित और सदियों से विवशता के थपेड़ों के साथ जी रही सामान्य जनता की कारूणिक दशा के चित्र हमारी संवेदना को जगाकर उद्योगपतियों की दमनकारी नीतियों के विरूध्द आम आदमी को जाग्रत करने में महती भूमिका का सतत निर्वहन कर रहे हैं। इस प्रकार के वर्णनों में जहां भी आवश्यक हुआ प्रेमचंद ने महात्मा गांधी के विचारों को आत्मसात करके अपने मानवतावादी दर्शन को प्रस्तुत किया है, उस पर कहीं-कहीं साम्यवादी विचारधारा की झलक मिल जाती है, किन्तु चिंतन का नजरिया उनका निजी है उसमें किसी मतवाद का आग्रह हमें दिखलाई नहीं पड़ता। वस्तुत: आज हर क्षेत्र में समन्वय-साधना की आवश्यकता है, जो प्रेमचंद के साहित्य में आसानी से देखी जा सकती है।
प्रेमचंद की दृष्टि में जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है। उनका कथन है कि साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाय किन्तु वही साहित्य कालजयी हो सकता है, जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलंबित होर् ईष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और वैराग्य, दुख और लाा ये सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं उन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना नहीं हो सकती। साहित्य के उद्देश्य के संबंध में प्रेमचंद के मौलिक विचार साहित्यकारों व कला-समीक्षकों को आज एक नया पाथेय दे सकते हैं। अस्तु, प्रेमचंद के साहित्य विषयक विचारों को इक्कीसवीं सदी की समीक्षा के कलागत मानदण्डों में सहज स्वीकार किया जा सकता है। संवेदना के धरातल पर तो वे सदैव अनुकरणीय व प्रासांगिक बने रहेंगे।
रीडर-विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग एवं शोध केन्द्र
एस.एम.जे.एन. कालेज, हरिद्वार
आवासीय पता-37, निरंजनी अखाड़ा, हरिद्वार
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