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हृदयहंता समय की विसंगतियों का भाष्य करते दोहे

डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ
'दोहा' हिन्दी का अपना छंद है, लोक की जमीन की उपज है। कभी इसे 'वामनावतार' कहा गया है तो देश के सौराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में इसे दसवें वेद के रूप में मान्यता मिली है-'दुहो दशमो वेद, समजे तेने साले', राजस्थानी के कवि जसराज का विचार था कि गर्दभ समान कुछ लोगों को छोड़ दें तो दोहा का प्रभाव बेहद संक्रामक और अपरिहार्य होता है-
'दुहै कहै रीझे नहीं, निपुण न मांडे कान।
3 माणस जसराज कहै, सीतल वाहन समान।'
हिन्दी में पिछले कुछ वर्षों में दोहा की फसल खूब लहलहाई है। इस फसल में जहां-तहां गाजर घास और खर पतवार भी भरी पड़ी है। जो कायदे से कवि होने की न्यूनतम पात्रता नहीं रखते, उनके भी दोहा-संग्रह दिखायी दे रहे हैं। जिन्हें पढ़कर पाठक रीझ सकें या वैचारिक तृप्ति का अनुभव करें, ऐसे दोहे कम देखने में आ रहे हैं। डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर के 720 दोहों की कृति आंसू का अनुवाद पढ़ते समय आश्वस्ति होती है कि उनके अनेक दोहे मात्र छंदविहीन की दृष्टि से दोहे नहीं हैं। इनमें अर्थगांभीर्य और संवेदनात्मक छुअन की उपस्थिति भी ध्यान आकर्षित करती है। कुछ दोहे प्रमाणस्वरूप देखे जा सकते हैं-
कल तक अपनी बाढ़ में, डुबा रही थी कूल।
प्रौढ़ बनीं नदियां, पहन, शालीनता दुकूल॥
जूठी प्लेटें नग्तन थप्पड़ घूंसा लात।
भोले बचपन को यही, दी हमने सौगात॥
धूप संटियां मारती, भर आंखों में आग।
सहमा मुरझाया खड़ा, आमों का यह बाग॥
तपै दुपहरी सास सी, सुबह बहु सी मौन।
शाम ननद सी चुलबुली, गरम जेठ की पौन॥
किसी लहर ने वक्ष पर, चुम्बन लिखा अधीर।
पागल मन अब तक खड़ा, उस सरिता के तीर॥
ये सारे दोहे भिन्न स्थितियों और मन: स्थितियों के व्यंजक हैं। वस्तुत: काव्य में यथार्थ के विभिन्न पक्षों पर इतना कहा-लिखा जा चुका है कि वस्तुगत नाविन्य के लिए बहुत गुंजाइश नहीं बचती है। फिर भी श्री यायावर कुछ नया कहने का प्रयास करते हैं। यदि कश्य सुपरिचित है तो उसकी कथन भांगिमा नयी अवश्य है। दोहा संग्रह अनेक शीर्षकों में विभक्त है और उनके अंतर्गत जनतंत्र के अन्तर्विरोध, आम आदमी की असहायता, पारिवारिक टुटन, अपसंस्कृति का प्रसार, पर्यावरण चिंता दहेज की विभीषिका जनसंख्या विस्फोट, भ्रूण परीक्षण, भ्रष्टाचार आदि अनेक मुद्दे विचारार्थ प्रस्तुत हैं। इनमें दोहाकार का अपना प्रगति का भी और रूढ़ि विरोधी विजन कहीं सीधे तो कहीं प्रकारान्तर से व्यंजित हुआ है-
माचिस-तीली ने कहा, सुन मिट्टी के तेल।
चलो आज फिर खेल लें, हम दहेज के खेल॥
यह भारत की भारती कैसे रहे स्वतंत्र।
पढ़े विश्व बाजार अब, बिको-बिको का मंत्र॥
पहला दोहा पारिवारिक त्रासदी के प्रति क्षोभ की अभिव्यक्ति है और दूसरा एक वैश्विक षडयंत्र के प्रति विरोध दर्ज कराता है। इधर पर्यावरण आदि विषयों पर लिखने की भेड़चाल ने दोहा का अहित ही किया है। डा. यायावर भी जब विषय की सीमा में बंधकर पर्यावरण, जनसंख्या, भारत माता, गंगा, अमर शहीदों आदि पर दोहे लिखते हैं तो तमाम कोशिशें और कौशल के बावजूद कम दोहे हृदय तक पहुंच पाते हैं। कवि को यह समय हृदयहंता लगा है अत: हृदय तक की यात्रा जरूरी है। वैसे डॉ. यायावर ने अप्रस्तुतों, बिम्बों के सहयोग से प्राय: दोहों को संप्रेषणीय बनाना चाहा है। उनके दोहों में कबीर जगनिक, निराला, प्रसाद, भीष्म विक्रम, राधिका आदि को इन दोहों में साभिप्राय समाविष्ट किया गया है और इनकी उपस्थिति से अर्थ-दीप्ति बढ़ी है। कुछ नए बिम्ब सहज ही ध्यान खींचते हैं-कोरामिन ले ताप का, चली धूप की नर्स। प्रूफ की अशुध्दियां कहीं-कहीं चिंत्य हैं। प्रात: का स्त्रीलिंग में प्रयोग (ंगजल सरीखी प्रात) और मध्याह्न को भी इसी तरह प्रयुक्त करना (कूकर सी मध्याह्न) प्रूफ अशुध्दि की ही मेहरबानी लगती है। समग्रत: ये दोहे दोहा की शर्तों पर थोड़े आखरों में बड़े अर्थ को वहन करने और संप्रेषित करने की गवाही देते हैं।
डी-131, रमेश विहार
अलीगढ़-202001


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