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खुदा भी जिसको तलाशता है, जनम-जनम का ंफकीर हूँ मैं। मेरे ही पीछे चले ामाना, समय का वो राहगीर हूँ मैं॥णंखम से खेलूँ, ांखम मैं झेलूँ, ांखम पिरोऊँ ंकलम के अन्दर, ंगाल की चादर बुनूँ मैं यारों, मगर असल में कबीर हूँ मैं।मेरे ही अन्दर बसी है मीरा, मेरे ही अन्दर बसी है राधा, वो ईश्क जिसने ंखुदाई पाई, वो ईश्क का ही ामीर हूँ मैं।क्यूँ रौशनी की तुम भीख मांगो, मेरे मुंकद्दर के चाँद-तारों, भिखारी बनके खड़ा है सूरज, बहुत ाियादा अमीर हूँ मैं।भले ही रावण का भेंस धर ले, हरण करेगा कहाँ से सीता, भले ही दोनों जहाँ तेरे हों, जिगर की छोटी लकीर हूँ मैं।भरम की तलवारें कब चली हैं, चली कहाँ है वो बादशाही, मुझे क्या दरबार में रखोगे, ंगुलाम हूँ, ना वाीर हूँ मैं।जहाँ जहाँ भी ंकदम रखूँ मैं, ंफना की मंािल के पार उतरूँ, उतर ही जाये जो रूह के अन्दर, निकल न पाये वो तीर हूँ मैं।
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