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कविता

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जाबाते-बेलगाम, कभी ंखुद से मिल के देख।
हसरत के ए ंगुलाम, कभी ंखुद से मिल के देख।

हर लम्हा सुब्हो शाम, कभी ंखुद से मिल के देख,
तेरा भी है मंकाम, कभी ंखुद से मिल के देख।

तेरा हरेक अक्स तुझे ढूंढ़ता रहे,
ए जिस्म के निााम, कभी ंखुद से मिल के देख।

औंकात के भरम में जले जाये रोशनी,
अंदर बुझे तमाम, कभी ंखुद से मिल के देख।

इक ंखास दिल के पास न अपनी तलाश कर,
मंकसद तेरा है आम, कभी ंखुद से मिल के देख।

तेरी हयात पर्दे की सौदागरी करे,
है ये संफर हराम, कभी ंखुद से मिल के देख।

ंखुद में समाके बून्द समंदर सा बह चले,
छलके हरेक जाम, कभी ंखुद से मिल के देख।

ता आसमान ंफख्र से उठ जाये तेरा सर,
मिट्टी को कर सलाम, कभी ंखुद से मिल के देख।

सजदा, नमाा, पूजा, आानों, की सुन कभी,
है सब का ये पयाम, कभी ंखुद से मिल के देख।



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