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कहानी

साया

णमीनो-आसमां ने मुझको कितना तरसाया, तलाशता रहूं कब तक मैं चांद का साया।' आधी शब में जब सारा कूचा अपनी बस्तियों समेत सिसकते सायों की चादर तले ख्वाबों के पैकर तराशता था, उसी वक्त, अपने मकान की तन्हा छत पे, दीवानगी के आलम में, मनके मासूम से कोने में, कोरे कागाात पे, चांद के नक्श उभारने की कोशिशों में यतीन बड़ी बेताबी से लगा हुआ था। एक वही चांद जो बादलों के घूंघट से आंख मिचौली खेलता हुआ घनी रात के सायों को अस्पष्ट बना रहा था। वो चांद के पैकर को पा लेता, कांगा पे उतार भी लेता, लेकिन चांद के साये को पाना उसे अब तक नसीब नहीं हुआ था।
छत के तन्हा कोने से बराबर नीचे के कमरे में यतीन की बूढ़ी मां लम्बे-लम्बे ंखर्राटों की तान से, सीना तान रही थी। छत पे बैठे हुए मां के ंकरीब होने का एहसास, ंखर्राटे ही उसके कान में घोल रहे थे। मां के सीने से लगे बरसों गाुर गये थे। लेकिन खुद अपने साये की पहेचान से वो अब तक मेहरूम रहा था। चांद के साये को तलाशता उसका मन अचानक ही बचपन की इक भयावनी मनहूस रात की तरंफ चल दिया..।
कड़ाकों की बिजली से गरजते आसमां तले एक शाम वो स्कूल से घर की वापसी को जा रहा था। घर से उसका ंफासला कुछ ज्यादा तो न था। लेकिन तो बारिश की चाबूकों ने उसे बेचैन कर दिया था। ंकदम लरा रहे थे। हाथ स्वयम् कड़ाकों में अपने होने का एहसास गंवा चुके थे। उसका दिमांग मानो कि बिजली में ंखाक होकर, सुन्न हो गया था। उसकी आंखों ने सामने खुद छलावा किया था। गैरों को क्या, वो ंखुद अपने आप को छूने से लाचार हो गया था। कड़ाकों की रोशनी में अचानक उसे अपने आगे अपने ंकद से बहुत लम्बा चौड़ा आकार फैलता हुआ नार आया। बिजली की सफेद रोशनी ने उसे प्रगट तो किया था लेकिन वो काला मनहूस स्वरूप धरे उसके आगे चल रहा था। उसकी चींख हलक से बाहर न आई। बारिश की पोची मिट्टी में न जाने कोई गर्त में गड़ता हुआ खुद को महसूस करने लगा। जब उसकी चींख हलंक से बाहर आई, उसने अपनी ही दहलीा पे बेचैन मां को पाया। वो लुढक़ के मां की बाहों में समा गया।
णमीन की बिजलियों का नाता आसमान की बिजलियों ने तोड़ दिया था। मां भी फानूस की हल्की-सी रोशनी की चादर में बच्चे से लिपट पड़ी थी। यतीन भी मां के धड़कते सीने में अगाध शांति महसूस कर रहा था। अचानक उसकी निगाह को फर्श पे लहराते हुए एक मनहूस काले आकार ने घेर लिया। वो सहमा सा चींख उठा, ''मां क्या ये वही..मनहूस है जो स्कूल से मेरे पीछे लगा हुआ है।''
''अरे! पगले ये तो मेरा साया है जो हल्की सी रोशनी में फर्श पे पथराकर मेरे होने का सुबूत दे रहा है। और तू एक बेजान साये से डर रहा है।'' मां ने फानूस हिलाते हुए कहा था।
''अरे! मां ये कोई साया-बाया नहीं है। ये तो वहीं मनहूस डरावना आकार है, जो मेरे पीछे पड़ा है। मुझे निगलने को। मां मैं तुझे कैसे बताऊं कि मैं बड़ी मुश्किल से इसका पीछा छुडाके घर तक आया हूं। और...ंफिर यहां भी वही आकार...।''
''नहीं बेटे ये तो साया है जो हर जिस्म से जुड़ा रहता है जो खुद अपना होता है। उससे कभी तू खौफ मत खाना।''
और मां के अंतर से शेर गैबी ंखामौशी में बोल रहा था।

मैं जिस निजात को चलता था जिस्म के अंदर।
वो मेरा अपना ही साया था, जिस्म के अंदर।

''मां ये साया है तो ंफिर काला क्यूं है। संफेद क्यूं नहीं।''
मां के पास फैलते अंधेरों में, एक टिमटिमाते फानूस के अलावा कोई जवाब ही न था। सो वो बेटे के भीगे सर को सहलाते हुए रात भर गोद में लिये बैठी रही।
उस रात से ही यतीन ने काले रंगों की पहेचान बनाने के लिये साये से अपना नाता जोड़ लिया था। बचपन ही से बांग की तितलियों के पीछे दीवानावार भागने वाला, आंखिर एक दिन एक काली तितली को माचीस के बक्से में कैद कर घर ले आया था। मां की चमकती हुई आंखों के आगे जब अधमुई तितली ने हल्के से अपने पर ंफड़फड़ाये तब मां जोर से चींख उठी थी।
''बेटा! कभी काली तितली को नहीं पकड़ा करते। ये अच्छा शगुन नहीं होता। वो हमेशा किसी अनहोनी की तरफ ही धकेल ले जाता है। तुझे क्या मालूम तेरे बाप ने भी एक काले सांप को रस्सी समझ पकड़ा था और उसके जहर से उसका बदन काला... हो गया था। इन्सान का लहू भी जब ंफिका पड़ सियाही सा काला पड़ जाता है तब मौत के काले साये उस पे घेरा करते है। तेरी बुध्दि भी क्या बिगड़ी है कि तू काले रंगों की शै के पीछे पड़ा हुआ है।''
''देख मां! अगर काला रंग मनहूस ही है तो! तू खुद अपने साये को मिटा क्यूं नहीं देती। अरे भगवान किशन भी काले रंग में रंगा ही तो था। तो ंफिर उसकी पूजा का साया लेकर हर कोई उसके पीछे क्यूं चलता है।''
पूजा क्या होती है। काला रंग क्या होता है। सियाहकारी क्या होती है। वो जानता न था। लेकिन काले रंग से उसकी निस्बत दिन दुगनी रात चुगनी होती गई। अपनी जवानी में भी वो साये से उतना ही खौफ खाता था जितना कि बचपन में। लेकिन अब वो तितलियां पकड़ने बाग-बगीचे में फेरे नहीं करता अपितु हाथ में ंकलम धरे, काली सियाही से, ख्वाबों की तितलियों को कांगा के फूलों पे उतार कर, ंगालों की आमद में लगा रहता था। उसकी ंकलम में आसमानी नीलरंगी सियाही का होना मुम्किन न था। क्योंकि काली सियाही से ही वो ामीन की ंखाक छाने गैब के सारे राा को पाने में लगा रहता था।
वो बारबार सोचता था कि ये जिस्म क्या है। मां जिसे साये का नाम देकर उसे बहला रही है वो दरअस्ल क्या है। यही जानने वो घंटों शायरी की समाधि में लगा रहता।

ंखला है, आब है, पत्थर है, कौन शै है तू।
लिये ंफंकत इसी जुमले को, बैठूं भीतर मैं।

संजीदगी का ाोर उसके मन पे संवार होने लगा था। वो अब एक साधारण शख्स से मिटकर नामवर शायर हो भारत के कोने-कोने में अपनी शायरी के दम-खम की मिसालें दे रहा था। हर बुलंद शायरी के साथ उसका नाम जुड़ गया था। लेकिन उसके मन से अभी तक वो सायों का डेरा नहीं हटा था जिस बीच वो अपना जिस्म ढूंढ रहा था।
नसीब ने उम्र को बढ़ावा दिया। संफर को बीच राह खड़ा किया। लेकिन शायराना मिााज ने उसे हम-संफर देने से इंकार ंफर्माया। शायरी का ये हुस्न परवर, किसी हसीना के हुस्न में खोने से खौंफ खाता था। ंकलम को चूमती उंगलियां, हंसी में कहराते होंठ और ंखुशियों के ंकहंकहे लगाता दिमांग किसी हम हुस्न के साये से लिपटने को ारा भी रााी न था। अंजाम में पीर-निढाल मां का ंकद ंफिक्र के सूखे मौसम में सिकुड़ छोटा हो गया था। लेकिन उसके ऐहसास के सायों का ंकद घर में बढ़ता जा रहा था।
''बेटे! शायरी ही तेरी जान है माना, लेकिन तू कभी-कभी मां के जज्बात को तो समझा कर! कब तक मेरे सूखे हाथों का खाना तू खायेगा। क्या मुझे मेरी बेटी के हाथ का पकाया नसीब नहीं करायेगा। अरे, तू तो देख ही रहा है। अब मेरा ंकद सिमट रहा है। मेरी उम्र के तवील साये घर में पथराकर मुझी पे वार कर रहे हैं। जब तू छोटा था तब मैं ही तुझे सायों से न डरने की सलाह देती थी। लेकिन आज बेटे मेरे ंखौफ के मनहूस साये मुझे ंखुद डराकर बेचैन कर रहे हैं। क्या तू तेरा कोई हमसंफर नहीं तलाशेगा, या फिर...।''
एक गीत स्पर्धा में यतीन को जज के नाते दावत मिली थी। सभी हिस्सेदार कविता-गीत के शौर्य को ललकारने में लगे थे। उसे भी स्वर सुर-राग के पैकरों पे अपनी सलाहियत की मुहरें लगानी थीं। वो हर कामयाबी हासिल कर चुका था। स्पर्धा के दरमियान एक ऐसी कविता ने अपना जलवा दिखाया, जो हुस्नो-जमाल के कंठ से आधी शब में हसीन लब्जों के पैकर बना के यतीन के दिलो-दिमाग पे किसी साये की तरह लिपट पड़ी थी। वो पहली बार किसी गैर की परछाई की कशिश में खो गया। मानो कि वो साया उसे लिपट एक हो गया हो।
घर लौट के बिस्तर पे जब उसने जिस्म फेंका तो उसे यू लगा कि उसकी बंगल में किसी साये ने अपना डेरा जमाया है। वो करवट बदल बदल के देख रहा था कि कहीं उसके अपने ही साये ने दुबारा जिस्म में दांखिल होने को मायाजाल तो नहीं रचा है। या ंफिर वो हसीना अपना साया उसके साथ छोड़ चल दी है।
नींद-ख्वाब बिस्तर-साया का ये सिलसिला नींद-रतजगे में ता-सुबह चला। जब सुबह के परिन्दे ने उसके कान भरे, तो आान की गूंजों में फैलती लम्बी सजदा-नवाज की ंकतारों में भी उसने एक ही साया पाया जो कल रात उसके बिस्तर में उसी के ंकरीब लगा हुआ था।
''ए भगवान। क्या कोई साया भी पूजा का रूप ले सकता है?''
वो मां से सायों के बारे में पूछता लेकिन अब के साये ने अपना स्वरूप ही बदल दिया था।
जिस्म-साया ंफिर एक हो अपने हमसाया की तरंफ माईल होते गये। रफ्ता-रफ्ता दो ंकलम अपने अलग-अलग अंदाज से एक ही कांगज पे हसीन शायरी के तसव्वुर बनाने के पैकर में जुट गई। यूं लगता दो जिस्म नहीं लेकिन दो अनजान साये, अपनी पेहचान बनाने की कोशिश में ही एक-दूजे से गुफ्तगू करने लगे हो।
मां का बचपन वाला वचन उसके दिल को सहलाने लगा था। 'बेटे साये कभी पराये नहीं होते। पराये साये को अपना लेना ही एक जिस्म का कर्तव्य है।' इसी ख़याल की गूंज में वो साये की इबादत में दिन रात लग गया। उसकी हर रात जो तन्हा मां के आगे कोरे कांगा कलम में ढल जाती थी वो अब के एक हसीन साये के साथ हम सायाई होने की कोशिश में लगी रहती थी। मां को तसल्ली तो थी कि मेरा बेटा एक साये से दूसरा साया पिरोने में लग गया है। लेकिन मां की नाब से एक ही आवाा फूटती जो उसे बेचैन कर देती थी।
'कहीं ये हसीना ंखुद सियाहकारी की अमानत बटोरे हुए मेरे बच्चे की उजली ंकिस्मत को जलाके काले पर्वत में ढाल तो नहीं देगी। मुझे उसके सायों की हलचल से ंखौफ होने लगा है। शायद ये साये उसकी बद गैरतों का मुझे सुबूत दे रहे हैं।'
मां कभी कभार गुस्से में बोल उठती, बेटे, मैं ही तुझे सायों से ंखौफ खाने से मना ंफर्माती थी, लेकिन आज मैं ंखुद अपने साये से डरने लगी हूं। हर रात मुझे एक काला साया नार आता है। जो मेरे तन मन में ालाला बरपा कर देता है। क्या बजा है, मैं नहीं जानती लेकिन जबसे ये शायरा का साया मेरे सर पे चढ़ गया है। मैं रात भर सो नहीं पाती हूं। क्या तुझे भी कुछ ऐसा ही..।'
'अरे मां। वहम तो स्वर्ग को भी नर्क में बदल देता है। इसकी गैरत पे शंक करना तेरे अपने आंचल पे शक करने के बराबर है। क्या तुझे तेरे बेटे पे भरोसा नहीं है। जबकि आज मैं सायों की पेहचान करने लगा हूं, तो क्या ंफिर दुबारा तू मूझे बचपन के वही आलम में-ले जाना चाहती है।'
यतीन की शायरी में वही बचपन तिंफ्लाना अंदाा से जुड़ा हुआ था। हसीना का साया उसके जिस्म में समा कर उसकी नाब का गीत बन गया था जिस आहंग से वो इबादत का हर स्वर राग गाने को बेचैन रहता ता। हर सुबह मंदिर में नरसिंह सा उसकी भक्ति में खोया हुआ शाम तक सूरज के बदलते सायों पे ंगौर फर्माता था।
एक दिन उसने देखा कि सूरज के सायों ने भी अपने ंकद से वफादारी निभाने में चूक की थी। शाम तक छत से लगे सूरज के बदलते सायों को वो देखता रहा। वो सोचने लगा 'सूरज जो इतना पवित्र है, महान है. ऋषि समान है, उसके खुद के साये ही अपने आकार बदल-बदल के प्रार्थना के रंग-रूप बदलते रहते हो तो फिर इंसान के जिस्म की क्या औंकात? उसके बदलते वक्त क़े सायों की क्या वंफा। क्या भक्ति।'
वो सोचते ही सोचते अपनी छत से की दीवार से टकरा गया।

दीवारों के साये बोले सूरज से डरते हो क्यूं।
उसको सर पे चढ़ लेने दो, हम भी उतना फैलेंगे।

हालांकि दीवारों के साये चढ़ते सूरज को मात देने आगे बढ़ ही रहे थे। उसकी संवेदना के सूरज के आगे आसमां को छूती ऊंची दीवार खड़ी हो गई।
जिस साये को वो सुनहरा पैकर समझ के शायरी के जिस्म में लपेटना चाहता था वही साया शाम के धूंधलके में एक बरगद के पेड़ तले तन्हा टेक्सी ड्राइवर के साये में ंखुद को पिघालने में मसरूफ दिखाई दिया। रात के पहले चरण में ये उसका आचरण समझ न आया। जब यतीन ने शायरी का चश्मा उतारकर हंकीकत के चश्मे से आंख फाड़ मंजर को जांचने की कोशिश की, तो उसे महसूस हुआ जिस चांद के साये को वो बरसों से ढूंढ रहा था, वही साया आज बरगद के पेड़ तले काली टेक्सी के मनहूस सायों में छिपकर किसी और मनहूस साये को चाटने में लगा हुआ था। वो आंख मल-मल के उस साये की सच्चाई को ख्वाब में बदलने की लगातार कोशिश कर रहा था। लेकिन वही साया दुबारा उसकी पलकों की छतों से कूदकर मनहूस सियाहकाराना खाई में न जाने क्या रंग ला रहा था।
फिर उसका ाहन बेदार होकर हकीकतों के घेरे में आ घिरा।

पूछेगा जब हंकीकत तेरा वजूद तुझसे,
बतला ही देना उसको, अपने बदलते साये।

छत ने तो चांद के साये का स्वरूप पा ही लिया था। छत तले तन्हा कमरे में बिस्तर से लगी बूढी मां चीख रही थी। 'बेटा शाम ढल चुकी है। जल्दी नीचे उतर आ। दरवाजा बंद कर मेरे करीब लेट जा। कहीं किसी खुले दरवाजे से कोई मनहूस साया कमरे में दाखिल हो तुझे-मुझे ना निगल जाये।'
यतीन ाीना उतरने लगा तो हर ाीने से लगा हुआ एक एक साया उसके साथ चल दिया। कमरे में दाखिल होते ही उसने एक नहीं, अनगिनत काले सायों का हुजूम घर में पाया। सभी साये एक दूजे से अनजान होके भी परिचित थे। जबकि सदियों के रिश्ते से जुड़े हुए मां-बेटे एक दूजे के इतने करीब होते हुए भी एक दूजे को ढूंढ रहे थे। काले सायों की भीड़ में परस्पर टकरा रहे थे। दोनों के बीच छत फाड़ के चांद का साया ऊंची दीवार बना चुका था।



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