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'आराम' वृध्दाश्रम में इक शाम, पश्चिमी आकाश से उतरकर सूरज ने आराम किया ही था। सूर्य-अवतरण का शिवरात्रि के शंखनाद-ढ़ोल-नगारे और आरती की प्रकाशमय गूंजों ने आह्वान किया था। शिव-स्तुति और मंत्र-ध्वनि के माहौल ने पूर्वीय संस्कृति को जीवंत रखा था। मगर वृध्दाश्रम के हर एक कोने से इस श्रध्दा पर फीटकार की चींखें उठ रही थीं जो संस्कृति के दावे को ंगलत साबित करने की कोशिशें कर रही थीं। दुर्भाग्यवश इन चीखों को शिव-स्तुति ब्रह्मनाद ने दबा रखा था।
वृध्दाश्रम के हर कमरे से एक-दो चेहरे अपने टूटे-बिखरे अतीत का दर्पण लिये एक-दूजे को ताकने लोबी में आ खड़े थे। उस शाम सूर्यास्त के काले रंग में एक गौर-सुर्ख रंग ने अपना चरित्र बनाया था। आश्रम में वैसे तो कभी-कभार एकाद ंफरिश्ता ईश्वरीय संकेत देने आ ही चढ़ता था जो मानव रचित इस पानखर को ंखुशबूओं से भर देता था।
उस शाम जिस ंफरिश्ते की आहटें गूंज रही थी, वह पश्चिमी संस्कृति के ंखून से रंगा हुआ एक अंग्रेजी बाबू था जो दाहोद नगर की ंखूबसूरत और देखने लायक जगह का चीतार करने नहीं, लेकिन भारतीय संस्कृति का अध्ययन कर उस पर एक थीसीस लिखने अमरिका से सिधारा था।
अनजान मुसाफिर को सुखराम ने रास्ता दिखाया था। सुखराम ग्रामीण बैंक के डीरेक्टर के नाते सुबह से ही उसके साथ लगा हुआ था।
उस शाम उन सभी मुरझाये हुए चेहरों पर नूर दुबारा छलकने लगा। उनके कंधे कई मुद्दत से किसी के स्पर्श को तरसते थे। उनकी धड़कनें किसी ािन्दा धड़कन में समाने को बेताब थीं। उनकी निगाहें सूर्यास्त में भी किसी वक्त के सूर्योदय को खोज रही थीं। उनका रोम-रोम किसी नौ-जवान के तंकाो में टूट रहा था। एक अपरिचित विदेशी की चहल पहल से दुबारा ािन्दा हो गये थे।
स्पर्श और संवेदना की कोई वाणी नहीं होती। वह तो स्वयम् ईश्वरीय चेतना ही से एक दूजे में समा जाते हैं। इसीलिये एक अपरिचित के चंद लम्हों के सानिध्य ने उन सब में प्राण भर दिये थे। इन बेजान मूर्तियों पर अंग्रेजी की भावनाओं का अभिषेक हुआ था। शिव स्तुति और मंत्रगान के आगे अंग्रो की सच्ची भावनाशील गुफ्तगू ने सही अर्थ में इन सबकी पूजा की थी।
अंग्रो तो अपनी संस्कृति को उजाकर कर, चंदा दे के चल पड़ा, लेकिन आश्रम में अपने होने का अमर नक्श छोड़ गया था। बैंकमें बरसों से गिनती में डूबा हुआ ये शेर बाजार का सौदागर सुखराम उन वृध्दों में अपने मां-बाप को खोजने लगा था।
सुखराम के बाप ने तो उसके पैदा होने के ंफौरन बाद अपना दम तोड़ दिया था। उसके मन की गहराई में लगी ंकब्र से सच बाहर आने को मचलता था। लेकिन मां ने ये कभी नहीं बताया था कि उसके बाप ने कैसे दम तोड़ा था। मगर उसकी पड़ोसन ने एक बार ाोरों से चिल्लाते हुए कहा था ''देख मूई। तू अपने पाप की कैसी साा भुगत रही है। जिस वृध्दाश्रम को बनाने में सारे गांव ने इन्कार किया था, उसी की दीवारों में तूने तेरे पति को लगा दिया। वैसे तो तू दायन है ही, तेरा पति तेरे करम से मरने वाला तो था ही, मगर भगवान ने ये काला टीका तेरे माथे नहीं, ंखुद अपने माथे पे लगाकर तुझे बचा लिया है। वर्ना तेरा पति इस आश्रम की टूटती दीवारों तले दब के मरता क्यूं।''
सुखराम जान चुका था कि जो दीवारें किसी के शरण के लिये उठाई जाती हैं, वे आसमान को भले न छू पाएं, ामीं की तहों में टूटकर किसी की जान ारूर ले लेती हैं।
सुखराम की मां चंदन जो कि एक भावनाशील औरत थी, वह पति को खोने के बाद सहरा-सी तप्त और सूखी हो गई थी। जिस आश्रम की दीवारों ने पति को दंफ् किया था, उसी आश्रम ने इन लाशवत वृध्दों की सेवा के लिये उसे रख लिया था।
सुखराम ने उस दिन से आज तक जिस वक्त क़ा संफर किया, अपने आप को अकाल वृध्द पाया। उसका बचपन वृध्दत्व की गोद में खेलते हुए जवान होने से पहले ही बूढ़ा हो गया था। हरे पत्तों को तरसती साखें सूखी तो नहीं लेकिन पीले-जर्द पत्तों में अपनी बहारें ढूंढती थीं। मां के सख्त तीखे रवैये से वह अपने आप को न केवल बूढ़ा, लेकिन कोई अनाथ होने की भावनाओं की बाढ़ में खोया हुआ भी समझता था।
चंदन तो वृध्दों की सेवा करते चल बसी। सुखराम जो ंगरीबी में सुख की तलाश में निकल पड़ा था, अमीर तो न हो पाया लेकिन अमीरी और दौलत के हिसाब-किताब में लगे एक शख्स के नाते बैंक का डीरेक्टर हो चुका था।
सख्तियां और रूक्षता झेलते-झेलते वह भी एक थोर (वृक्ष) की तरह नुकीला हो गया था। सुखराम एक ऐसा नाम था जो कर्मचारियों को दु:ख की अंतिम अनुभूतियां कराने से कभी न चूकता था। उसकी अतृप्ति का एहसास एक ऐसे चरम पर था जो ंखुद अपने ही बीवी-बच्चों को अपने सही रिश्तों में स्वीकारने को रााी न था।
बीबी ने तो सुखराम के होते हुए बेवा-सी ािन्दगी गुजारी। उसके दो लड़कों ने तंग आकर अपनी जन्मभूमि त्याग कर एक-एक कर विदेस में कारोबार जमाया।
उसका तीसरा लड़का जो बाप के दु:ख दर्द समझने में कुछ हद तक जागृत था वह भी बाप की तंगदिली की तपिश को झेल न पाया। दोपहर के बाद शाम के ढलने का उसका इंतिाार नाकाम रहा। सो वह भी अपनी दो औलादों को बाप के हवाले कर परदेसी चक्की में पिसवाने को रवाना हो गया।
सुखराम की गृह व्यवस्थाएं टूट चुकी थीं। आश्रम व्यवस्था पर संत मुनिराम अपना प्रभावशाली प्रवचन दे रहे थे जिसे बेजान सुखराम हाथी से कान हिला के सुन रहा था। वन प्रस्थान करते समय पिछली पीढ़ी को नई पीढ़ियों की कौन सी चीा का ंखास ध्यान रखना चाहिए उस पर गंभीर चर्चाएं हो रही थीं। सार सिर्फ यही था कि पिछली पीढ़ी को अपनी मौजूदा पीढ़ियों के मनोभाव को बराबर समझके ही उनके साथ ंकदम मिलाने चाहिए। वर्ना गांव में सिंर्फ एक ही नहीं, हर घर-घर में एक वृध्दाश्रम स्थापित होगा। ये हकींकत हर एक बाुर्ग पर लागू पड़ती थी।
सुखराम को केवल धन की पीढ़ियों के अलावा किसी से कोई निस्बत न थी। न तो वह अगली पीढ़ी का था, न ही पिछली पीढ़ी का। धन के मायाजाल में डूबा हुआ ये पाखंडी एक ऐसा ताज पहने अपने शाही ंगुरूर में इस हद तक डूब गया था कि वह ंखुद अपनी औलादों को समझने से इंकार कर चुका था। उसके साथ लगे दो छोटे-छोटे मासूम बच्चे जो मां की पनाह को तरस रहे थे, वे खुद अपने आपको लाचार और अपाहिज समझने लगे थे।
एक दिन उसके दरवाजे पर एक अपरिचित शख्स ने दस्तक दी। दरवााा खुलते ही उसके हाथ में एक कवर की सौगात भेंट हुई। सुखराम जो हर सुबहो-शाम कुछ ऐसे ही कवर को खोल कर नाच उठता था, उस दिन कवर खुलते ही ाहरीली घुटन मेहसूस करने लगा। वह आंखें मल-मल के कांगज में किसी बैंक या कंपनी के शेरों की मुहर या दस्तंखत तलाश करने लगा। लेकिन वहां तो किसी फाौदारी कोर्ट के ंफैसले की काली मुहर लगी थी।
उस रात वह करवटें बदल-बदल अपने सायों में किसी ंखौफ को तराशने लगा। बाप के साये को बदन में न समाने वाला, मां की परछाई पर थूंकने वाला, बीबी के माथे को कभी ना चूमने वाला, बच्चों के सीनों को अपने स्पर्श से मेहरूम रखने वाला, सुखराम बिना जंग के खंडहरों तले दंफन होने जा रहा था। जो अपनों की निजी भावनाओं के बहाव के आगे चट्टान सा मौंजों को तोड़ने के जुर्म में अज्ञात बेड़ियों में कैद हो चुका था।
दूसरे दिन का सूरज जो उसका बैंक के आलिशान कमरे में प्रमुख की चेयर पर बिठा के उसके ंकदमों तले बैठने वाला था। उसी सूरज ने उसको बदचलन देख अपना अनुक्रम बदला था।
दूसरे दिन ंफिर उसके दरवाजे पर दस्तकें गूंज उठीं। एक अजनबी चेहरा ंफिर उसे तकने लगा।
''सुखरामजी क्या आप हैं। आपको ंफौरन अभी 'आराम' वृध्दाश्रम के संस्थापक निमुबेन ने बुलाया है। वे आपसे कुछ चर्चाएं करना चाहती हैं। आप एकाद घंटे के लिए भी..।''
सुखराम के ंकदम लड़खड़ाने लगे थे। ािन्दगी की राहें बदल चुकी थीं। जिस बीबी के केन्सर के इलाज में उसने चवन्नी तक देने से इंकार किया था, उस पर दस लाख का बिल न चुकाने के लिये उसके बेटों ने ंकर्जे का दावा कर घर से निकाल देने का ंफैसला किया था। जिसका वारंट कल सुबह ही उसके हाथ में आया था।
लड़खड़ाते ंकदम, लराती सांसें, तो धड़कनें थामे वह जैसे-तैसे करके वृध्दाश्रम के आंगन तक तो आ पहुंचा, मगर वह उसकी दीवारें छू न पाया।
''मूई। तेरे काले करम से ही तेरा पति, इन दीवारों तले दब के मर गया था।'' वही पड़ोसन की चींखें उन्हीं दीवारों में ंफिर ािन्दा होकर उसके रूह को चीर गई।
बाप का अनदेखा चेहरा उसके रू-ब-रू खड़ा हो गया। अब तो वृध्दाश्रम के हर निवासी के चेहरे में उसे बाप नज़र आने लगा। एक वृध्दा किसी कोने में एक नया पौधा लगाने में मसरूंफ नार आई।
उसे यूं लगा कि ये आश्रम के पेड़ क्या इतने बूढ़े हो गये हैं कि उन्हें एक नन्हें पौधे के सहारे की ारूरत है। या ंफिर, यह मां जो पौधा लगा के सींचने वाली है, क्या मानव जीवन का वही सिलसिला रचा रही है जिसे हम बचपन-जवानी-बुढ़ापा या अनाथाश्रम-गृहआश्रम-वृध्दाश्रम के नाम से जानने लगे हैं।
वह सोच में यूं डूब गया कि उसे इतना होश न रहा कि कब मैनेजर ने उसका शाना हिलाके उसे जगाया।
''सुखरामजी। आईये, आपका हमारे आश्रम में स्वागत है। पहले तो आप एक अंग्रेजी बाबू को ये दिखाने आये थे, लेकिन आज आप ही के अंग्रेजी बेटों ने आपको हमारे आश्रम का रास्ता दिखाया है।''
सुखराम कुछ समझ नहीं पाया। ''भाई साब आप ये क्या ंफर्मा रहे हैं।''
'' जनाब! मैं अगर कुछ कहूंगा तो शायद आप मान नहीं पाएंगे, लेकिन हमारा तो ये राो का कारोबार है। यहां हर राो एक ािन्दा लाश गाड़ी जाती है, हर राो हम उसे निकाल कर जीवित करते हैं। और उसको गाड़ने वाला मुर्दा शख्स अपनी बीबी में अपनी सांसों को खोजकर ािन्दा रहने की नाकाम कोशिशें करता है। मगर आपकी तो बात ही कुछ और है।''
''क्या मतलब।''
''जनाब। आप अगर इस ंखत को पढ़ेंगे, तो सब जान जायेंगे।''
''संस्थापक श्री, हमें बड़े अंफसोस के साथ ये ंखत आपको लिखना पडा है। इस ंखत के साथ हम आपको हाार डालर का एक चेक 'आराम' आश्रम के नाम भेज रहे हैं। इसे जमा कराते ही आप हमारे पिताजी सुखराम को अपने आश्रम में एकाद कमरे में आजीवन ठहराने की व्यवस्था कीजियेगा। हम ज्यादा बहस में पड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हिन्दू संस्कृति के नाते न तो सुखराम ने हमारी मां को अपनाया था, न हमें बेटों का प्यार दिया था। हम अभी भले अंग्रेजी ंफजा में आ गये हैं। लेकिन हिन्दू धर्म के नाते हमारे बाप की देखभाल को हम नकार नहीं पायेंगे। इस बाप में इक बाप का दिल न होने से उसे वृध्दाश्रम के सीने में समाके जीवन भर का सुख दें ऐसी आप सब से प्रार्थना है।''
सुखराम के दो हाथ जो बैंक के ड्राफ्ट और शेरों के कांगाात मेंं रंगे रहते थे, वे अचानक आश्रम की दीवार पे चिपककर काले पड़ गये।
वृध्दाश्रम की गहराई से एक गैबी आवाा आई।
''बेटे। अगर इस दुनिया में कोई भी तुझे संभाले नहीं, तो मैं तुझे अपने सीने में ारूर बसा लूंगा। क्योंकि मेरा तन मन आत्मा एक ऐसा वृध्दाश्रम है, जिसकी थाह कोई नहीं पा सकता।''
वृध्दाश्रम की दीवारें ालाले की तरह टूट पड़ी।


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