ईमान की रोशनी
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शाम का सूरज आंखरी सांसें ले रहा था। रफ्ता-रफ्ता अंधेरे हाथ में कंफन लिए आगे बढ़ रहे थे। चारों ओर मातम-सा सन्नाटा छाया हुआ था। वैसे भी गांव ने दंगों की रिगफ्त से कुछ घंटे पहले ही राहत पाई थी। रास्तों को वीरानियों ने घेर लिया था। मगर कुछ ारूरतमंद सूरतें चलती फिरती नार आती थीं। एसटी डेपो के बराबर सामने लगी हुई कंगन की दुकान का माहौल राो की तरह स्वस्थ नार आता था। मेहमूद भाई दंगों के इम्तिहान के बीच भी शायरी के आलम में डूबे हुए थे जैसे कि सूरज के ढलने और इन्सानी जिस्मों के अचानक अकाल बुझने से उनका रूहानी रिश्ता हो। कंगन की दुकान पर हर शाम भावनाओं का मेला लगता था। मेहमूदभाई के नर्मो-नाजुक दिल ने कई परेशान लोगों को आसरा दिया था। सामिर भी उनमें से एक था। वह अपनी उलझनों से राहत पाने हर शाम कंगन की दुकान पर ही डूबते सूरज को सलामी देता था। शाम के सूरज को अंधरों ने कंफन ओढ़ा दिया था। रफ्ता-रफ्ता कुमकुमों की रोशनी अंधेरे पर फैलती जा रही थी। सामिर वापस अपनी मां की बुझती हुई ािन्दगी के ंखयालों में डूब गया। मां को ब्रेइन टयुमर हो गया था। टाटा अस्पताल के डॉक्टरों ने भी उम्मीदें छोड़ दी थीं। ंगरीबी ने घेरा डाल रखा था। सही इलाज के सामने हर पल ंगुरबत ने अपना पंजा लड़ाया था। थाइरोईड का र्मा था मां को। उसका इलाज इतना ंखौंफनाक साबित होगा, उसका तो ंखयाल तक न था। रेडियो एक्टीव आयोडीन का ाहर रग रग में फैल गया था। सही वक्त पर सही डॉक्टर को दिखाना उसके बस में न था। आखिर र्मा की शांखें ब्रेइन में फैल गई थीं। अब तो रही-सही उम्मीदों ने भी पतझड़ को अंजाम दे दिया था। घने अंधेरों को वह दूर तक ताक रहा था। उसे कोई उम्मीद नार न आती थी। पांच-दस हजार रूपयों का... वह मन ही मन में बड़बड़ाने लगा। क्या चंद रूपयों की मेहरूमी मुझे मां से अलग कर देगी। ए ंखुदा, क्या मेरी मां की ािन्दगी को तूने चंद रूपयों के तराजू में तोल रखा है। अगर तेरा यही चलन है, यही तंकाजा है, तो तू सामने क्यों नहीं आता। तेरे होने का सबूत क्यों नहीं देता। सवालों और शिकायतों का दौर मन ही मन में चल रहा था कि उसकी नार भागते हुए स्कूटर के सवार पर पड़ी। सवार तो पलक झपकते ही ओझल हो गया। पर, वह अपने संफर का नक्श वहां छोड़ गया था। उसके स्कूटर से एक बेग रास्ते पर गिर पड़ा, जिसे सामिर की नार ने लपक लिया। सुनसान रास्ते पर उसके अलावा और कोई न था। एक बोान बेग था, जिसे उसने अपने लरज़ते हाथों से उठा लिया। बेग उठाते वक्त उसने ंखुद को भी मां-सा बेहोश पाया। वह बेग खोल न पाया। वह घर लौटा। मां की सांसें तो चल रही थीं। उसके उछलते सीने में ंगमों का परबत दबा पड़ा था। मां की अधखुली आंखों में वह बार-बार झांकने लगा। जैसे कोई बच्चा सोई हुई मां को जगाने की चेष्टा न करता हो। कमरे के कोने में एक नन्हा-सा दिया झिलमिला रहा था। उसकी रोशनी में उसने मां के सामने बेग रखा। उसे इतना होश कहां था कि उसकी मां खाट पर बेहोश पड़ी है। बेग खोलते ही उसकी आंखें तो हुई। उसे बेग में पांच हाार के बंडल नार आए। साथ में एक डायरी भी जिसमें बेगवाले का नाम व पता लिखा हुआ था। वह दुबारा अपने होशों-हवास खो बैठा, फिर से बड़बड़ाने लगा ... देख मां, ािन्दगी भर तूने मुझे ंखाली हाथों ही लौटते पाया है, लेकिन आज मैं रूपयों से भरा बेग ले के आया हूं। तू मेरे इलाज को तरसती थी ना, और मैं अभागा तुझे कुछ दे न पाया था। पर आज मैं तेरे सीने की, तेरे दूध की कीमत चुकाऊंगा। मेरे सर से अब्बाजान का साया भले ही हट गया है। मैं अब तेरे बदन में फैलते ाहर को मिटा दूंगा, मैं तुझे अब मरने नहीं दूंगी। आज मेरे ईमान को, मेरी शरांफत को ंखुदा ने बख्शा है। मैं इन रुपयों से तेरा इलाज करवाऊंगा। तुझे नई ािन्दगी दूंगा। मैं तुझे..... आंखों में आंसू का समंदर उमड़ रहा था। इक ओर बेहोश मां के हालात ने उसे अधमुआ बना दिया था, तो दूसरी ओर अचानक हाथ लगे रुपयों का शोर उसके दिमांग में गूंज रहा था। अचानक उसके कानों में दो तरंफा आवाजें गूंजने लगी। जैसे कि मां कि आत्मा फिर जागके बोल रही हो। 'बेटे, मेरे लाल, मेरी जान की ंकीमत चाहे कुछ भी हो, क्या तेरे ईमान की ंकीमत सिंर्फ पांच हाार रुपये है। क्या तू इक मां की ंखातिर तेरे ईमान का सौदा करेगा। अरे बेटे, ईमान मां की जान से कई गुना महान होता है। मां तो मरने को पैदा होती है और मर भी जाती हैं लेकिन इमान कभी नहीं मरता। उसकी रोशनी कभी नहीं बुझती।' ईमान की गूंज मंदिर में बजते घंटे और मसिद की आानों की तरह कमरे की दीवारों में गूंजने लगी। उसने मां की ाबीं को चूमा। ंकदमों को सजदा किया और फौरन बेग हाथ में थामे रात के अंधेरों में मां को ंखुदा के हवाले कर निकल पड़ा। सूरज दफ्न हो चुका था। इधर मां भी उसी मंािल को चूमने जा रही थी। वह बेगवाले का पता पूछते उसके घर तक तो पहुंचा। लेकिन बदंकिस्मती से उसके दरवाजे पर ताला पाया। पड़ोस से पूछताछ करने पर पता चला कि बेगवाले की मां सख्त बीमार थी। जिसे कौार अस्पताल में भर्ती किया गया था। उसकी उलझनें और बढ़ गई। इक ओर उसकी मां आंखिरी सांसें ले रही थी तो दूसरी ओर किसी कि मां उसकी हमसंफर हो गई थी। अजीब इन्तिंफांक ने उसे घेर लिया था। वह अस्पताल पहुंचा। बेगवाले साहब को ढूंढ निकाला। बेग उसके हाथ में थमाकर, वह अंधेरों के साथ अपने घर को वापस लौटा। कमरे के कोने में दिये की लौ कम हो रही थी। धुंधली-सी रोशनी में वह फिर बड़बड़ाने लगा - 'देख मां, आंखें खोल, मैं आ गया हूं। मां मैंने मेरे ईमान का सौदा नहीं किया है। मां, मैंने तुझे धोखा नहीं दिया है। आंखिर मैं तेरा ही तो बेटा हूं। मां, आज तूने मेरी आंखें खोल दी है। तूने मेरे ामीर को जगा दिया है। तूने मेरे ईमान को नई रोशनी दी है। मां देख आंखें तो खोल....' और, कोने में जलता हुआ दिया बुझ गया। मां के जिस्म से लिपटकर वह फूट-फूटकर रोया। अब्बाजान का साया तो सर से हट ही चुका था, मगर आज उसके शाने पर हाथ रखने वाला, मां को कांधा देने वाला कोई भी न था। बुझे हुए दिये का धुआं अंधेरे में मौत की सूरत तराश रहा था। खुले दरवाो से थोड़ी सी रोशनी कमरे में फैल रही थी। अचानक उसके शाने पर किसी ने हाथ रखा और सिसकियों से कमरा भर गया। सामिर ने मुंह फेर के देखा तो उसके बेगवाले साहब का धूुंला चेहरा नार आया। उसकी भी आंखों में आंसू का समंदर उमड़ पड़ा था। वह सामिर के ंकदमों में गिरकर, फूट-फूट कर रोया। 'आज अगर आपने मुझे वे पैसे न लौटाये होते तो शायद मेरी मां भी...आप की मां की तरह....।' और, कमरे के कोने में दिया फिर से झिलमिला उठा।
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