Taptilok | Hindi Literary Magazine published from Surat, Gujarat, India. | Add to favorites
सम्पादकीय ताप्ती प्रवाह कविता कहानी लघुकथा व्यंग ललित निबंध
साहित्य विचार संस्कृति चिंतन जीवन विवेक ग्रंथावलोकन समाचार यात्रा-वृत प्रतिभाव
लोकतेज देश - दुनिया के ताजा समाचार
सम्पादकीय

साहित्यकार का सरोकार

मदनगोपाल दवे
यह संभव नहीं कि भावनाओं, संवेदनाओं, वैचारिक शक्ति और कल्पनाशीलता के बिना साहित्य सृजन हो सके, और इन सबको पोषण मिलता है हमारे आसपास के परिवेश के वर्तमान सक्रिय स्वरूप, या भूतकाल की मस्तिष्क में बनी छवियों से, जो मिश्रित हो कर भविष्य की परिकल्पनाओं का रूप भी लेती हैं। उनसे मिलने वाले विषय - वस्तुओं को लेखनी कागज पर उतारती है कभी अक्षरों के रूप में, कभी चित्रों के रूप में तो कभी संकेतों के रूप में। यही समय के साथ साहित्य की विविध विधाओं के रूप में मानव समाज के समक्ष आता है। यह साहित्य कभी कल्पनाओं की अनकहीं, अनजानी दुनिया की सैर कराता है तो कभी समदेहधारी मनुष्य को इस तरह से श्रृंगारित कर देता है कि वह कभी रति तो कभी देव तुल्य दिखने लगता है। यही साहित्य कभी कभी सामाजिक सरोकार को अपनी लेखनी का माध्यम देता है तो इतिहास गवाह है कि इससे क्रान्तियां हुई है जिन्होंने मानव सभ्यता पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इनसे थोड़ा इतर देखें तो साहित्य लोक में वही प्रिय हुआ या प्रभावी हुआ है जिसने आम आदमी की भाषा में उसकी भावनाओं को प्रकट किया। भले ही वह भाषा की शुद्धता की कसौटी पर खरा न उतरता हो पर उसने हर वर्ग के आदमी के मन-मस्तिष्क और जबान पर अपना अधिकार जमाया। चाहे हम कबीर या सूर की मिसाल दें या फिर गीता और रामायण की, ये सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा इसी कारण बन पाये है कि ये आम आदमी के सरोकार प्रकट करते हैं। कहना यह है कि साहित्य या वैचारिक ताकत आम आदमी से अपना संबंध जोड़ पाये तो ही उसका सृजन सार्थक माना जा सकता है। इसकी वर्तमान काल खण्ड में अति आवश्यकता है जब हमसे संबंधित हर क्षेत्र में नितांत गिरावट देखने को मिल रही है। साहित्यकार की वैचारिक शक्ति, कल्पनाशीलता, परीक्षण क्षमता, नजरीया आम इंसानों से अधिक होता है, चाहे वह कम हो या ज्यादा। उस अधिक को वर्तमान समय मांग रहा है, चाहे जरिया कोई भी हो कविता हो या लेख, गद्य हो या पद्य, व्यंग्य हो ंगाल। हर ओर पूंजीवाद की पैदाइश बाजारवाद के कारण हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक और वैयक्तिक मूल्यों में आयी गिरावट अब दिखने से ज्यादा प्रभावित करने लगी है, और कभी-कभी लगता है इससे पनपी संवेदनाओं में जड़ता हमारे अस्तित्व को निर्जीव अंकों की श्रेणी में ही रखने को तत्पर हैं। इस स्थिति को भांपने, आकलन करने, आम जन के समक्ष उसे उसकी भाषा में प्रस्तुत करके इसके समाधान की रूपरेखा व्यावहारिक रूप से समझाने की महती अपेक्षा मानव सभ्यता का वर्तमान काल खण्ड साहित्यकारों से कर रहा है। भौतिक सुख प्राप्ति की असीम महत्वाकांक्षाओं से ग्रसित संपूर्ण व्यवस्था ने प्रकृति व मानव को संसाधन का रूप तो कभी से दे दिया है, पृथ्वी पर आदि काल से इन्हीं महत्वाकांक्षाओं ने कई लकीरें खींच कर मानव को एक इकाई का स्वरूप भी दिया है। परिणामस्वरूप समाज-प्रकृति का असंयमित दोहन तो संतुलन बिगाड़ ही रहा है, उन पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के हेतु से धन के माध्यम से समाज में आतंकवादी हिंसा, अप्रामाणिक व्यावसायिक गतिविधियाें से मानवीय अधिकारों का हनन करते हुए, आम नागरिक के सुख चैन को समाप्त करने की कगार पर ले जा रहा है। अपराधों की प्राधान्यता व उनको राजनैतिक संरक्षण की इस बेला में जहां धन ही साध्य बन चुका है, साहित्य को अपनी अवतारी भूमिका निभाने का अवसर मिला है, ऐसा लगता है। यदि साहित्यकार संयमित जीवन शैली के उपचारों को आम जनजीवन की भाषा में परोसने के साथ अर्थ प्रधान व्यवस्था को बदलने की दिशा में अपनी विषय वस्तुओं को दिशा प्रदान करने का प्रयास करें तो एक नये प्रकार के साहित्य सृजन के साथ जीवन में विवेक की परिभाषा को पुन: स्थापित करने का काम किया जा सकता है। संदर्भ यह है कि वैश्विक व्यवस्था अपना पतन खुद देख रही है। आम आदमी मानव से अधिक मशीन में बदलता जा रहा है जो अंतत: साहित्य सृजन के मार्ग ही बंद कर देगा। क्या ऐसा लगता है कि जीवन जीने के साधनों को हासिल करने के प्रयासों के बाद समय के इस दौर में साहित्य का सृजन जारी रह पाएगा? एक तरह से साहित्य से मानव सेवा का यह सर्वोत्तम समय है।


हमारे साथ विज्ञापन करें | अपने सुझाव | सबस्क्राईब करे | सूचना | हिन्दी साहित्य की प्रमुख वेबसाईट्स
ताप्तीलोक पब्लिकेशन्स, गंगोत्री, न्यू सिविल रोड, सूरत - 1
2005-07 copyright www.taptilok.com | Taptilok | Hindi Literary Magazine
Designed by Sri Technocrat | Best viewed in 800 X 600