भीतर झलझल
|
पंकज त्रिवेदी
|
भोर भई है। मजेदार ठंड की रूनझुन सवारी धीर-धीरे धरा पर दौड़ रही है। हिनहिनाते सात-सात तोंखारों पर सवार, भगवान सूर्यदेव को भी अपनी आगोश में समाकर बैठी इस ठंड का प्रभुत्व तो देखो! उनकी समय निरंतरता पर भी पाबंदी लगा दे तो इंसान की क्या बिसात? भोर होते ही ग्वाले गाय दुहने लगते हैं। ग्वालण दूध भरी वटलोई सर पर रखकर झांझर की रनकार के ताल पर निजत्व के आनंद में ठुमक-ठुमक चलती दिखाई देती है। सारी रात चौकीदारी करते श्वानों की कौआनींद उनकी आहट से उड़ जाती है। एक श्वान कान खड़े करके पूरा शरीर खींचकर सुस्ती को जड़ से उखाड़ देता है। पंखियों का कलरव सुनते ही सूर्यदेव की अमीदृष्टि का तो समग्र विश्व में चेतना भर देता है। फूल एक-दूसरे के सामने निर्दोष, खुशमिााज होकर मानो गोष्ठि करने लगते हैं। उन पर पड़ रहे ओस बिंदुओं को बेध कर सूर्यकिरन मेघधनुषी रंगों की आभा बिखेरती है। प्रकृति ने इंसान को अमूल्य जीवन के साथ अंजली (संपुट) भर बहाने दिए हैं। भूमिपुत्र बैलगाड़ी में बैठकर मस्ती से देसी भजनों और लोकगीतों को गुनगुनाता हुआ खेत की ओर चल पड़ता है। उसके मन श्रम ही जीवन है। पुरूषार्थ ही सेवा है। जगत की भौतिकता के पीछे अंधी दौड़ लगाने के बदले उसके मन तो 'मिट्टी' का ही मूल्य यादा है। मिट्टी का स्पर्श उन्हें जीवन की गहराई को पाने में मदद करता है। इसीलिए ही उनके मन जीवन यानी प्रेम, पुरूषार्थ, श्रम, त्याग और उसमें से मिलता निर्दोष आनंद! यहां तो दौड़-धूप करते है अंखबार बेचने वाले फेरीवाले। उनकी काली स्याही के बीच बिखरे है कई स्त्रियों के सौभाग्य सिंदूर। यहां तो इंसान की यातनाओं की चिल्लाहट का गला घोंटा जा रहा है। धमाल के बीच दौड़ते धन, सत्ता और सम्मान के भूखे लोग, राोमर्रा का जीवन जीते या सच्चाई के लिए तबाह होते, किसी के गंदे खेल का भोग बनाने वाले लोगों को पहचानने का समय ही कहाँ? संबंधों पर तुच्छ स्वार्थ के उजले कपड़े पहनकर फिरते है सब! खुद को मिली सत्ता-संपत्ति, अपना व्यक्तित्व या सामाजिक प्रतिष्ठाओं का कवच बनाकर बैठे इंसान के भीतर की घबड़ाहट देखी है कभी? लावा से लबालब इंसान सौम्यता का मुखौटा पहनकर जीते है, तब राख में दबे अंगारे जैसे लगते हैं। हमारा बाह्य स्वरूप दिखाने वाला बड़ा साधन तो हमारे पास है, आईने में सभी इंसान को खुद का चेहरा रूपवान ही लगता है! इंसान अपने आप को फुलाने का स्वीकार जल्दी करता है, सिकोड़ने का नहीं। सँकरी जगह से दूसरे को जाने देने में खुद को सिकोड़ना पड़े तो स्वाभाविकता नहीं होती, उसमें तो क्रोध या नंफरत का भाव ही मिलता है। किसी से धक्का लगे तो सिर्फ शरीर ही सिकुड़ता है। शरीर के साथ मन को भी तैयार करने पर दोनों का आनंद संभाल पाएंगे और समभाव भी। किसी के धक्के से भीतर खलबली नहीं होती, ऐसा क्यूँ? मेरा होने का गर्व सबको होता है, अपना होने का नहीं! ऐसी छोटी-छोटी बातें भीतर से कोंपल बनकर पनपकर बड़ा-सा पेड़ बने। सेवा करने के लिए तबाह न होकर ारूरत के अनुसार खुमारी को प्रकट करनी चाहिए। ऐसी खुमारी संस्कार से मिलती है, किसी की सलाह या ंखुशामत से नहीं। नित्यकर्म, ािम्मेदारियां और मानवीय गौरव मिले ऐसे जीवन को जीने में सफलता न मिले तो भी क्या? सेवा के नाम पर बने मायाजाल में फंस न जाएं, इतनी सावधानी रखेंगे तो भी खुद की सेवा ही होगी। पहले हम अपने ही अंदर बिलोना घुमाएं। उसमें जो अच्छा-बुरा है उसे अलग-अलग रखें। इंसान अनुभव से जो ज्ञान प्राप्त करता है, ऐसा ज्ञान शायद ही कहीं ओर से प्राप्त कर सके। इंसान को अपनी दृष्टि को शिक्षा देनी होगी। सिर्फ बातें करने से क्या ंफायदा? सधी हुई दृष्टि कई बुराइयों से मुक्ति दिलाती है। उसके लिए उसे 'मन' के साथ दोस्ती करनी पड़ती है। मन की शुध्दता और दृष्टि की निर्मलता ही पवित्रता बख्शती है। मार्क्स ओरेलियस ने कहा है कि आपके पास जो नहीं उसका नहीं, मगर जो है उसका ही विचार करें। और आपके पास जो है उसमें से उत्तम चीज के बारे में यह सोचो कि वह नहीं होती तो उसे प्राप्त करने के लिए कितने आतुर होते? हम कभी भी अपने अंदर खोज करते ही नहीं। परिणामस्वरूप हमारे ही अंदर जो उत्तम शक्ति है उसे पाकर संतोष भी नहीं मान सकते। इस शक्ति का सही उपयोग करने के बजाय उसे ही ढूंढ़ने के लिए अंधी दौड़ लगाते है। ऐसे समय निजत्व में शक्ति और प्रतिभा पनपती नहीं है। बल्कि उसका अपने आप नाश हो जाता है। हमारे ही अंदर खोज करने में जितनी गंभीरता से कार्य करेंगे उतना ही ज्यादा और उत्तम पाएंगे। कुदरत ने तो हम सबको मन भर के दिया है। सवाल तो उसे परंखकर सही उपयोग करने की हमारी चतुराई पर है। हमारे अंदर कुछ भी होने की संभावना और बाहर से कुछ पाने का प्रयत्न हमें पसंद है। चलो अब, सूर्य की किरन अवनी पर फैल गई है। ठंडी का चमकार तो कुछ पल है, क्यूंकि सूर्य तो सनातन है। जीवन में ठंड के बादल घिर जाएंगे मगर सत्यरूपी सूर्य हमारे साथ होगा तो वह हमेशा तप्त रहेगा और जीवन जीने के लिए सूर्य की अवमानना करें तो भी उसे क्या फर्क पड़ेगा मेरे भाई!
|
|
|
|
|
|