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सम्पादकीय

हम बौद्धिक क्या कर रहे हैं?

घनश्यामप्रसाद सनाढय
सूरत से प्रकाशित गुजराती दैनिक गुजरात मित्र में चर्चापत्र स्तम्भ में पिछले महीने गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति श्री गोविन्दभाई रावल का एक पत्र प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने प्रवर्तमान अवसादपूर्ण परिस्थिति में बौद्धिकों की भूमिका को उजागर करते हुए उनका आह्वान किया है कि वे इस परिस्थिति पर केवल आक्रोश व्यक्त करने और ऑंसू बहाने के बजाय किंचित स्वयं जागृत व संगठित होकर इस चुनौती का मुकाबला करने के लिये आगे आयें। श्री रावल का पत्र इतना स्पष्ट है कि हम ताप्तीलोक के पाठकों के समक्ष उसका अविकल हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं।
चर्चापत्र में श्री गोविन्दभाई लिखते हैं, 'अब दो वर्ष में तो 21वीं शताब्दि का एक दशक समाप्त हो जायेगा। विज्ञान, तकनीकी और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे साधन हमें सुलभ और हस्तगत हो गए हैं। लोकतंत्र जैसी जीवन पद्धति का हमने स्वीकार किया है। हमारी नई पीढ़ि उद्योग, व्यापार, अनुसंधान, सेवा, प्रत्येक क्षेत्र में अपना जौहर दिखा रही है। तो फिर गरीबी और बेकारी क्यों नहीं मिटती? आतंकवाद ने जीवन की सुरक्षा को क्यों अगवा किया हुआ है? भ्रष्टाचार का अजगर क्यों हमारे विकास को निगले जा रहा है?
कारण यह है कि हम बाह्य रूप से भले ही आधुनिक दिखायी पड़ते हों, लेकिन हमारी मानसिकता में तो हम आज भी मध्ययुगीन सामंतवादी मनोदशा में ही जी रहे हैं। जाति-पाँति, ऊँच-नीच, धर्म-संप्रदाय, वर्ण-लिंग, और पक्ष-विपक्ष के संकुचित दायरों से हम बाहर निकलते ही नहीं हैं। हम पटेल-क्षत्रिय, आदिवासी-दलित, गुजराती-मराठी, हिन्दू-मुस्लिम, श्वेत-अश्वेत, स्त्री-पुरुष, काँग्रेसी-भाजपायी होने के भँवर में ही चक्कर खाये जा रहे हैं।
जातिवाद, संप्रदायवाद, धर्मवाद, प्रांतवाद, भाषावाद को भड़काकर स्थापित हित लोक भावनाओंके साथ खिलवाड़ करके जान-माल की बर्बादी कर अपनी अपनी खिचड़ी ही पकाये जा रहे हैं। ये सभी अपने अपने स्वार्थवश अंधे होकर देश, समाज, और प्रकृति का सत्यानाश करने पर आमादा हैं। न शिक्षा, न धर्म और न ही राजनीति हमें सिखला रही है कि हम पहले मनुष्य हैं, पहले नागरिक हैं। परन्तु मैं पूछता हँ कि भला हम बौद्धिक क्यों गहरी नींद सो रहे हैं? हम क्यों कर एक साथ काम नहीं कर सकते? विनोबाजी कहा करते थे वैसी हिंसा-शक्ति की विरोधी और दंड-शक्ति (राज्य-शक्ति) से सर्वथा भिन्न तीसरी शक्ति, नागरिक शक्ति, क्यों नहीं संगठित होती? समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाशास्त्रियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों, समाजसेवकों को एक मँच पर आकर बौद्धिकों-प्रबुद्ध नागरिकों की तीसरी शक्ति के रूप में आगे आना चाहिये। परन्तु हम सब कहाँ हैं? पक्ष-निरपेक्ष भूमिका पर व्यापक लोक-शिक्षण और लोक-संगठन के द्वारा लोकतंत्र के लिये लोकशक्ति को जागृत करके नागरिक संगठन खड़ा करना हमारी सबकी उच्चतम अग्रिमता होनी चाहिये। यही आज के युग की माँग है, आज के युग की चुनौती है। अन्यथा भावि इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा।'
श्री गोविन्दभाई रावल एक सन्निष्ट और प्रतिष्ठित गाँधीवादी चिंतक और विचारक हैं। जीवन भर वे शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। विनोबा के आचार्य कुल से संलग् रहते हुए उन्होंने लोक-शिक्षण और लोक-संगठन के माध्यम से तीसरी शक्ति को उभारने का कार्य जीवन भर किया है और आज भी वे इस दिशा में सक्रिय हैं। अतएव, हम समझते हैं कि उनके आह्वान का हम बौद्धिकों पर अवश्य ही प्रभाव पड़ेगा। हम जानते हैं कि अनेक बौद्धिक लाचारीवश या लोभवश राज्य-शक्ति के पीछे पीछे चलते रहने को मजबूर हैं। और कुछ मोहग्रस्त लोग ऐसे भी हैं जो बौद्धिक कम और राजनैतिक विचारधारा के प्रचारक अधिक हैं। ऐसे लोगों से अधिक आशा नहीं की जा सकती। परन्तु, अधिकांश बौद्धिक राज्य अथवा राजनीति से स्वतंत्र हैं और उन्हें देश और समाज की उतनी ही चिंता है जितनी अन्य किसी को। आवश्यकता केवल उनके एक मँच पर आने और राज्य-निरपेक्ष और राजनीति-निरपेक्ष तीसरी शक्ति लोकशक्ति को उभारने की है। हम आशा करते हैं कि हम बौद्धिक इस बारे में अवश्य सक्रिय होंगे।


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