अधूरे चेहरे
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डॉ. बिमलेश तेवतिया
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'अधूरे चेहरे' में संकलित कहानियां भारत पाकिस्तान और लंदन की उर्दू पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित हुई हैं। 1999 में इन कहानियों को एकत्रित करके उर्दू संस्करण छापा गया जिसकी व्यापक सफलता के बाद लेखक ने 2005 में इस कहानी संग्रह का हिन्दी संस्करण प्रकाशित किया। भूमिका की यह स्पष्टता पढ़कर मन में एक ललक जाग्रत हुई। लेखक का मुझसे कोई परिचय नहीं था परंतु उनकी ये कहानियां पढ़कर पहचान बन गई है और सब कुछ परिचित-सा लगता है। 16 कहानियों का यह संग्रह काफी रोचक है। 'अधूरे चेहरे' की प्रत्येक कहानी एक प्रतीक-सी जान पड़ती है। इन कहानियों का हर एक पहलू जाना पहचाना लगता है। समाज की उथल-पुथल, टूट-फूट, अनमेल शादियां, तलाक आदि इन कहानियाें के मुख्य विषय हैं। ये कहानियां केवल जग बीती नहीं बल्कि आप बीती के टुकड़े हैं जिन्हें कहानीकार ने बड़ी समझदारी से नए नए शीर्षकों का रूप दे दिया है। इन रचनाओं में चरित्रों का निरूपण बड़ी सहजता से साकार हुआ है। ये कहानियां लेखक की सूझबूझ और गहन अध्ययन की झांकी कराती हैं। मानवीय संबंधों को किस तरह समझा जा सकता है उसका परिचय भी इनमें मिलता है। इन कहानियों का अपना एक अंदाज है। जो समाज की हकीकत को उभारने में सफल हुआ है। लेखक जो कुछ पाठकों को कहना चाहता है उसे उसने पूरे विश्वास से कागज पर उतारा है। जिंदगी के अनुभव जब कहानी बनते हैं तो उन्हें किसी बाह्य आवरण की जरूरत नहीं होती, वे बिना साज-साा के अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं। ये कहानियां समाज का आईना हैं। हमारे समाज की एक-एक अंगिकाएं अर्थात यूं कहा जाय कि ये अंश कणिकाएं हैं। अगर हम इन कहानी आईनों में कोई अपना भयानक चेहरा देखने का नैतिक साहस कर लें तो शायद ही हमारे कर्म कभी उस दिशा में गति कर पाएगें। 'काला गुलाब' में व्यक्त प्रेम की तड़प, आवेगों के कारण उत्पन्न विकट परिस्थिति और मानवीय सहज पश्चाताप का एहसास साहजिक है। 'ड्रिफ्टवुड' कहानी पढ़ते समय अजीव-सी घुटन महसूस होती है, यथार्थ का एक नंगा चित्र जो बड़ा घिनौना लगता है। पिता पुत्री के संबंधों को सहज स्वीकार कर लेना, क्या यह भारतीय संस्कृति में स्वीकार्य है? परंतु आज इन पाक संबंधों की सीमा टूटती जा रही है, पतन की खाई गहरी होती जा रही है। 'सुमन कर्नल कौल के साथ चिपटकर सो जाती। पहाड़ों की सर्दियों में एक दूसरे के बदन की हरारत बड़ी लाभदायक होती है। धीरे-धीरे जब सुमन के शरीर में परिवर्तन आने लगे तो इस सामीप्य ने नए ही गुल खिलाए। हर रात शराब पीना कर्नल कौल की आदत बन चुकी थी और फिर शराब के नशे में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना उनके बस में न था।' मामूली स्पर्श से भी वे उत्तेजित हो उटते। बिस्तर पर लेटते ही कर्नल कौल सुमन के शरीर पर अपना हाथ फेरने लगता और फिर समय बीतने के साथ-साथ अंगुलियों की यह खोज बहुत आगे निकल जाती। दूसरी ओर सुमन के अंग भी समय से पहले ही विकसित होने लगे। अन्तत: भावनाओं ने चेतना की लक्ष्मण रेखा को लांघकर सुमन की जिंदगी में उथलपुथल मचा दी। 'सुमन के शब्द' आई लव यू डैड...आई लव यू डैड...। छिछरे जरूर लगते हैं परंतु यह वर्तमान का कड़वा सच है।' जिसे लेखक ने नैतिक रूप में प्रकट किया है। 'अधूरे चेहरे' में व्यक्त दकियानूयीपन की झलक, जिन्दगी की तबाही, पति पत्नी के संबंधों में दरारें, दूरियां और अजनबीपन की छाया मंडराती है। बच्चों में पनपता खालीपन इस कहानी का मूल हार्र्द है। 'रिश्ता का दर्द' कहानी में एक पति ने अपनी बीवियों की अर्थी को कई बार कंधा दिया है। शोक और उदासी उस कहानी के आधार है। अधूरी आकांक्षाएं ,मध्यम वर्ग का मानव समाज, स्वाभिमानी और बोल्ड स्त्री का चरित्र, ब्यूटीफूल औरत के रूप में एक पत्नी का ख्याल अभयसिंह को जेल की कोठरी तक पहुंचा देता है। अधूरे चेहरे ने पति पत्नी के वास्तविक चित्र को लेखक ने खुली आंखों से देखा है। मन की तरंगे और दकियानूसी निर्णय को तबाह करने के कारण बन जाते हैं। 'अचानक' कहानी में प्रेम, स्नेह, सौहार्द और उमंगों के साथ प्रकृति का सुंदर खुशहाल वातावरण चित्रित हुआ है। नेतागिरी का खुला बयान और घटनाओं का क्रम इस कहानी में नये नये मानवीय भावनाओं के चित्र अंकित करता है। यहां पर सोमनाथ का बलिदान धर्म निरपेक्षता का जीता जागता उदाहरण है। 'किरचियां' कहानी में शादी के बंधन में विश्वास नहीं, महत्वाकांक्षाएं असीम है, प्रेम की तड़प मजाक बन कर रह जाती है। इस कहानी में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि जिंदगी को तराशने में आस-पास के परिवेश का बहुत बड़ा योगदान होता है। अगर यह परिवेश अनुकूल न हो तो बड़ी घुटन सी महसूस होती है। समझौता जीवन जीने का विकल्प नहीं, छोटी-छोटी कड़वाहटों से रिश्ते टूट जाते हैं, जीवन के अध्याय में नये पन्ने जुड़ने लगते हैं और परिणाम असहनीय बन जाते हैं। 'वेश्या' एवं 'राख का ढ़ेर' कहानियां भी जीवन के चित्रों की रेखाएं है। कहानीकार ने समय का रंग भर कर इन्हें वास्तविकता प्रदान की है। 'जागो' में कहानीकार कहता है, भगवान, अल्लाह , गोड, वाहेगुरू एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं और तुम हो कि फिर भी सो रहे हो। मानव ने उनको झिंझोडा है लेकिन खुद सो रहा है। अपने पापों का पायश्चित करने के लिए दौड़ो। भगवान कृपालु है। अल्लाह रहीम है। गोड इज मरसीफुल। रब दयालु है। वो नतमस्तक मानव की भूलों को क्षमा कर देंगे। और पापों भरी स्लेट साफ हो जाएगी। इस कहानी में मनुष्य की अराजकता, भ्रष्टाचार, नैतिक मूल्यों के पतन को चित्रित किया गया है। इसके अलावा अन्य कहानियों में भी दिल का दर्द, मन की उर्मियां कराहती हुई नजर आती है। मस्तिक तो लकवाग्रस्त हो गया है। इंसानियत मर गई है। भाईचारा और संबंध दाव पर लगे हैं। 'एक ही खत', 'डाइनिंग टेबल', 'बीते हुए पलों की कसक', 'आत्महत्या', 'बँटी हुई औरत', अधखिली और 'केंचुली' में समाज की हकीकत, प्रेम का उन्माद , भ्रष्टाचार का आतंक, न्याय की दुहाई, कानून का मजाक, रिश्ते-नाते और संबंधों के टूटने की चरमराहट का सुन्दर विनियोग किया गया है। इन कहानियों में दीपक बुदकी ने समाज के अंतरपटल को पृष्ठभूमि पर लाने का प्रयत्न किया है। ये समाज की हकीकते हैं जिन्हें स्वीकारना मानव के लिए चुनौती है। इस कहानी संग्रह की हर कहानी में आधुनिक युग के बदलते परिवेश में मानवीय संवेदनों की परछाइयां झलक रही हैं तथा तस्वीरों में मानव के अस्पष्ट, धुंधले, और अधूरे चेहरे झलक रहे हैं।
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1, गायत्री सोसायटी, नर्सरी रोड, बीलीमोरा, जि. नवसारी. गुजरात
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